अभ्यासस्यादिर्हल् शिष्यते, अन्ये हलो लुप्यन्ते। इति वलोपः।
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३९६- हलादिः शेषः। हल् प्रथमान्तम्, आदिः प्रथमान्तं, शेषः प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य की अनुवृत्ति आती है।
अभ्यास का आदि हल् शेष रहता है और अन्य हलों का लोप होता है।
द्वित्व होने पर पूर्व की जो अभ्याससंज्ञा हुई थी, उसमें यदि अनेक हल् हैं तो आदि में विद्यमान हल् ही शेष रहता है और अन्य हलों का लोप हो जाता है। यह सूत्र आदि
हल् का शेष हो इतना ही कहता है, आगे अन्य का लोप हो यह अर्थ स्वतः आ जाता है। यह सूत्र अचों का लोप नहीं करता। जैसे भूव् में भू और व् दो हल् है, उनमें से भू शेष रहता है और व् का लोप होता है। उकार जो अच् है वह तो रहेगा ही।