Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 394
द्वित्वविधायकं विधिसूत्रम्
लिटि धातोरनभ्यासस्य
Aṣṭādhyāyī 6.1.8
Vṛtti Varadarājācārya

लिटि परेऽनभ्यासधात्ववयवस्यैकाचः प्रथमस्य द्वे स्तः, आदिभूतादचः

परस्य तु द्वितीयस्य। भूव् भूव् अ इति स्थिते।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

३९४- लिटि धातोरनभ्यासस्य। लिटि सप्तम्यन्तं, धातोः षष्ठ्यन्तम्, अनभ्यासस्य षष्ठ्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। एकाचो द्वे प्रथमस्य और अजादेर्द्वितीयस्य का अधिकार आ रहा है।

लिट् के परे होने पर अनभ्यास धातु के अवयव प्रथम एकाच् को द्वित्व हो जाता है परन्तु यदि धातु का आदिभूत ( पहला अक्षर ) अच् हो तो उस अच् से परे दूसरे एकाच् भाग को द्वित्व होता है।

जिस धातु की अभी तक अभ्यास-संज्ञा नहीं हुई है, उस धातु को द्वित्व होता है, लिट् लकार के परे रहने पर। यदि धातु में अनेक अच् हों तो हल्-सहित प्रथम एक अच् को द्वित्व होता है और यदि धातु का आदिवर्ण अच् हो और धातु अनेकाच् हो तो प्रथम एकाच् को द्वित्व न होकर द्वितीय एकाच् को द्वित्व होता है।

यद्यपि इस सूत्र की अनेकाच् धातुओं में ही प्रवृत्ति होनी चाहिए, क्योंकि अनेकाच् धातुओं में प्रथम एकाच् या द्वितीय एकाच् हो सकता है, फिर भी एकाच् धातुओं में व्यपदेशिवद्भाव से अनेकाच् मानकर द्वित्व किया जाता है।