भूतानद्यतनपरोक्षार्थवृत्तेर्धातोर्लिट् स्यात्। लस्य तिबादयः।
३९२- परोक्षे लिट्। परोक्षे सप्तम्यन्तं, लिट् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अनद्यतने लट् से अनद्यतने की अनुवृत्ति आती है और भूते और धातोः का अधिकार चल रहा है।
भूत, अनद्यतन परोक्ष अर्थ में रहने वाली धातुओं से लिट् लकार होता है।
बीते हुए समय को भूत कहते हैं। अपने इन्द्रियों के पीछे को परोक्ष कहते हैं। जो आज का हो उसे अद्यतन कहते हैं और जो आज का नहीं है, उसे अनद्यतन कहते हैं। ये तीनों अर्थात् भूत, अनद्यतन, परोक्ष एक ही क्रिया में हों तो ऐसी धातुओं से लिट् का प्रयोग होता है। केवल भूत में नहीं, केवल परोक्ष में नहीं और केवल अनद्यतन में नहीं, तीनों एक साथ होने पर इस सूत्र की प्रवृत्ति होती है। लिट् में भी टकार और इकार की इत्संज्ञा और लोप हो जाने के बाद लू ही बचता है तथा लकार के स्थान पर उसी प्रकार से तिप्, तस् आदि होते हैं।