तथाभूतेऽस्मद्युत्तमः।
प्रयोग हो या प्रयोग की सम्भावना हो कहने का तात्पर्य यह है कि कभी-कभी युष्मद्-शब्द के प्रयोग न होने पर भी किन्तु उस समय में भी अन्य किसी शब्द का प्रयोग नहीं होना चाहिए। जैसे- त्वं गच्छसि या गच्छसि। युष्मत् शब्द के साक्षात् प्रयोग में तो मध्यमपुरुष होता ही है साथ ही उसकी सम्भावना मात्र में भी मध्यमपुरुष होता है। इसके लिए ही सूत्र में स्थानिनि शब्द का प्रयोग हुआ है। स्थानिनि पद का अर्थ वृत्ति में अप्रयुज्यमाने किया है। जिसको आदेश होता है, उसे स्थानी कहते हैं। आदेश होने के बाद स्थानी का लोप हो जाता है अर्थात् प्रयोग में नहीं रहता। अतः स्थानिनि का स्थानी के प्रयोग न होने पर इतना अर्थ हुआ। स्थानिन्यपि इसमें अपि शब्द के जुड़ने से अप्रयुज्यमाने प्रयुज्यमाने च अर्थात् प्रयोग न होने पर और प्रयोग होने पर भी, यह अर्थ निकलता है। २८४- अस्मद्युत्तमः। अस्मदि सप्तम्यन्तम्, उत्तमः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। युष्मद्युपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यमः से उपपदे समानाधिकरणे स्थानिनि अपि इतने पदों की अनुवृत्ति होती है।
तिङ् के वाच्य (अर्थ) जो कारक (कर्ता अथवा कर्म), उसको बताने वाले अस्मद्-शब्द के उपपद में होने पर, उस अस्मद् शब्द का प्रयोग होने पर या प्रयोग न होने पर विवक्षा मात्र होने पर भी उत्तम-पुरुष होता है।
इसकी व्याख्या भी पूर्वसूत्र की तरह ही समझनी चाहिए। वहाँ युष्मद् शब्द के विषय में मध्यमपुरुष का विधान है तो यहाँ अस्मद्-शब्द के विषय में उत्तमपुरुष का विधान है। जैसे अहं गच्छामि अथवा गच्छामि इन प्रयोगों में अस्मद् शब्द का प्रथमान्त रूप
अहम् कर्ता के रूप में प्रयुक्त है अथवा गच्छामि इस क्रिया में कर्ता अहम् विवक्षित है, क्योंकि लट् लकार कर्ता अर्थ में हुआ है। अतः समानाधिकरण है। फलतः उत्तमपुरुष का प्रयोग हुआ।