Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 383
मध्यमपुरुषविधायकं विधिसूत्रम्
युष्मद्युपपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यमः
Aṣṭādhyāyī 1.4.105
Vṛtti Varadarājācārya

तिङ्वाच्यकारकवाचिनि युष्मदि प्रयुज्यमानेऽप्रयुज्यमाने च मध्यमः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

३८३- युष्मद्युपपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यमः। युष्मदि सप्तम्यन्तम्, उपपदे

सप्तम्यन्तं, समानाधिकरणे सप्तम्यन्तं, स्थानिनि सप्तम्यन्तम्, अपि अव्ययपदं, मध्यमः प्रथमान्तम्,

अनेकपदमिदं सूत्रम्।

तिङ् के वाच्य (अर्थ) जो कारक (कर्ता अथवा कर्म), उन्हें बताने वाले

युष्मद्-शब्द के उपपद में होने पर, उस युष्मद् शब्द का प्रयोग होने पर या प्रयोग न

होने पर विवक्षा मात्र होने पर भी मध्यमपुरुष होता है।

सूत्र में पठित समानाधिकरणे का ही अर्थ है- तिङ्-वाच्य-कारकवाचिनि।

समानाधिकरण एक ही अधिकरण में रहने वाले को कहते हैं। अर्थ में शब्द वाच्य-वाचकभाव

सम्बन्ध से रहता है। अतः अर्थ ही शब्द का अधिकरण(आधार) होता है। यदि दो शब्दों के

समान अर्थ हो तो उन शब्दों को समानाधिकरण शब्द कहा जाता है। जब तिङ्-प्रत्यय का

कर्ता या कर्म अर्थ होता है और उसी अर्थ को युष्मद् शब्द कहता है तो समानाधिकरण

युष्मद्-शब्द हो जाता है। जैसे त्वं पठसि में कर्ता अर्थ में विहित लकार के स्थान में सिप्

आदेश होने से उसका भी कर्ता ही अर्थ है और उसी कर्ता अर्थ को प्रथमान्त युष्मद्-शब्द

अर्थात् त्वम् कह रहा है। अतः तिङ्-वाच्य (अर्थ) जो कारक (कर्ता), उसका वाचक

युष्मद्-शब्द होने से अर्थात् समानाधिकरण होने से मध्यमपुरुष हुआ है। उसी प्रकार मया त्वं

ज्ञायसे(मुझ से तुम जाने जा रहे हो) में कर्म अर्थ में विहित लकार के स्थान पर आए हुए

से(थास्) का भी कर्म ही अर्थ होता है और उसी कर्म अर्थ को इस वाक्य में प्रथमान्त

युष्मद्-शब्द कह रहा है। अतः तिङ् का वाच्य (अर्थ) जो कारक (कर्म) उसका वाचक

युष्मद्-शब्द होने से अर्थात् समानाधिकरण होने से मध्यम पुरुष होता है। लकार कर्ता, कर्म

और भाव अर्थ में होते हैं। अतः उसके स्थान पर आये हुए तिङ् का भी वही अर्थ होता है।

तिङ् के वाच्य भाव(क्रिया) के साथ समानाधिकरण अर्थात् उसी अर्थ को कहने वाला

युष्मद्-शब्द कभी भी नहीं हो सकता। इसलिए अवशिष्ट तिङ् का वाच्य कारक जो कर्ता

या कर्म, उस अर्थ को कहने वाले युष्मद्-शब्द होने पर मध्यमपुरुष होता है। इसी प्रकार

अस्मद्युत्तमः सूत्र में समानाधिकरणे जाकर अस्मदि का विशेषण बनता है। अतः उस सूत्र

का तिङ्-वाच्य कारक कर्ता या कर्म तद्वाचक अस्मद्-शब्द के उपपद में होने पर उत्तमपुरुष

हो, ऐसा अर्थ बनता है। जहाँ युष्मद् और अस्मद् दोनों समानाधिकरण न हो अर्थात् युष्मद्

और अस्मद् शब्द तिङ्वाच्य कारक कर्ता या कर्म के वाचक न हों, अपितु कोई दूसरा

समानाधिकरण हो तब प्रथमपुरुष होता है।

उपपदम्। उप=समीप में उच्चारित, पदम्=पद। युष्मद् शब्द के समीप में उच्चारित

होने पर मध्यम पुरुष होता है किन्तु वह युष्मद् शब्द तिङ् के वाच्य कारक कर्ता या कर्म

के वाची के रूप में समान अधिकरण में हो तो। तात्पर्य यह है कि उस वाक्य की जो क्रिया

है, उसमें लकार, तिप् आदि जिस अर्थ में हुआ है उसी अर्थ के लिए युष्मद् शब्द का प्रयोग किया जाता हो। जैसे- त्वं पुस्तकं पठसि इस वाक्य में पठसि क्रिया में लट् लकार कर्ता अर्थ में है और वाक्य में भी युष्मद् शब्द का प्रथमान्त रूप त्वम् कर्ता अर्थ में प्रयुक्त हो रहा है। अतः दोनों का एक ही अधिकरण हुआ। एकाधिकरण अर्थात् समानाधिकरण होने से पठ् धातु से मध्यमपुरुष हुआ। यदि भिन्न अधिकरण होगा तो मध्यमपुरुष नहीं होगा। जैसे- रामस्त्वां पश्यति इस वाक्य में दृश् धातु से लकार तो कर्ता अर्थ में हुआ और युष्मद् शब्द भी कर्म अर्थ में द्वितीयान्त होकर प्रयुक्त हो रहा है फिर भी कर्ता और कर्म भिन्न-भिन्न अधिकरण होने के कारण समानाधिकरण नहीं हुआ। अतः मध्यमपुरुष न होकर प्रथमपुरुष हुआ। इसी तरह अहं त्वां कथयामि इस वाक्य में भी कथय से लकार कर्ता अर्थ में हुआ है और युष्मद् शब्द का द्वितीयान्त रूप कर्म अर्थ में प्रयुक्त हुआ। इसलिए यहाँ भी युष्मद् शब्द समानाधिकरण नहीं हुआ। अतः मध्यमपुरुष नहीं हुआ।