Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 381
प्रथमादिपुरुषसंज्ञाविधायकं संज्ञासूत्रम्
तिङस्त्रीणि त्रीणि प्रथममध्यमोत्तमाः
Aṣṭādhyāyī 1.4.101
Vṛtti Varadarājācārya

तिङ उभयोः पदयोस्त्रयस्त्रिकाः क्रमादेतत्संज्ञाः स्युः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

३८१- तिङस्त्रीणि त्रीणि प्रथममध्यमोत्तमाः। प्रथमश्च मध्यमश्च उत्तमश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वः प्रथममध्यमोत्तमाः। तिङः षष्ठ्यन्तं, त्रीणि प्रथमान्तं, त्रीणि प्रथमान्तं, प्रथममध्यमोत्तमाः प्रथमान्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में लः परस्मैपदम् से परस्मैपदम् और तङानावात्मनेपदम् से आत्मनेपदम् इन दोनों पदों को षष्ठीविभक्ति में बदलकर परस्मैपदस्य,

आत्मनेपदस्य की अनुवृत्ति लायी जाती है। इसीको सूत्र की वृत्ति में उभयोः पदयोः से कहा गया है।

तिङ् के दोनों पदों अर्थात् आत्मनेपद और परस्मैपद के तीन-तीन त्रिक क्रम से प्रथमपुरुष, मध्यमपुरुष और उत्तमपुरुषसंज्ञक होते हैं।

त्रिक का अर्थ तीन का समूह। परस्मैपद के नौ और आत्मनेपद के नौ इन प्रत्ययों के तीन-तीन त्रिक बना लिए गये। परस्मैपद में तिप्, तस्, झि का एक त्रिक, सिप्, थस्, थ का दूसरा त्रिक और मिप्, वस्, मस् का तीसरा त्रिक, इसी प्रकार आत्मनेपद में भी त, आताम्, झ का एक त्रिक, थास्, आथाम्, ध्वम् का दूसरा त्रिक और इट्, वहि, महिङ् का तीसरा त्रिक, इस प्रकार से तीन तीन त्रिक बनाकर इन त्रिकों की क्रमशः प्रथमपुरुषसंज्ञा, मध्यमपुरुषसंज्ञा और उत्तमपुरुषसंज्ञा होती है। इस प्रकार से परस्मैपद में तिप्, तस्, झि की प्रथमपुरुषसंज्ञा, सिप्, थस्, थ की मध्यमपुरुषसंज्ञा और मिप्, वस्, मस् की उत्तमपुरुषसंज्ञा हुई। आत्मनेपद में भी त, आताम्, झ की प्रथमपुरुषसंज्ञा, थास्, आथाम्, ध्वम् की मध्यमपुरुषसंज्ञा और इट्, वहि, महिङ् की उत्तमपुरुषसंज्ञा हुई। इस प्रकार इन प्रत्ययों को प्रथमादि पुरुष में विभाजित करने के बाद अग्रिमसूत्र से एकवचन, द्विवचन और बहुवचन संज्ञाएँ की जाती हैं।