Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
Show
VṛttiGovind
LSK 380
परस्मैपदविधायकं विधिसूत्रम्
शेषात् कर्तरि परस्मैपदम्
Aṣṭādhyāyī 1.3.78
Vṛtti Varadarājācārya

आत्मनेपदनिमित्तहीनाद्धातोः कर्तरि परस्मैपदं स्यात्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

३८०- शेषात्कर्तरि परस्मैपदम्। शेषात् पञ्चम्यन्तं, कर्तरि सप्तम्यन्तं, परस्मैपदं प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में भी भूवादयो धातवः से धातवः प्रथमान्त पद को पञ्चमी एकवचन में बदल कर धातोः की अनुवृत्ति की जाती है।

आत्मनेपद के निमित्तों से रहित धातुओं से कर्ता में परस्मैपदसंज्ञक प्रत्यय होते हैं।

जिस धातु में आत्मनेपद प्रयोग के लिए जो-जो भी कारण बताये गये हैं, यदि वे कारण न हों तो उन धातुओं से परस्मैपद होना चाहिए। शेष का अर्थ कहने से जो बचे-उक्तादन्यः शेषः।

आत्मनेपद के विधान के लिए अनेकों सूत्र हैं। इस प्रकरण में तो बस दो ही सूत्र दिये गये हैं। जो धातु उन सूत्रों के कथन के अन्तर्गत नहीं आती हैं, उन समस्त धातुओं से परस्मैपद का विधान करना इस सूत्र का कार्य है।