Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 379
उभयपदविधायकं विधिसूत्रम्
स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले
Aṣṭādhyāyī 1.3.72
Vṛtti Varadarājācārya

स्वरितेतो जितश्च धातोरात्मनेपदं स्यात् कर्तृगामिनि क्रियाफले।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

३७९- स्वरितजितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले। स्वरितश्च ञ् च स्वरितजौ, तौ इतौ यस्य स स्वरितजित्, तस्मात्- स्वरितजितः! कर्तारम् अभिप्रैति=गच्छति इति कर्त्रभिप्रायम्(फलम्) तस्मिन्। क्रियायाः फलं क्रियाफलं, तस्मिन्। स्वरितजितः पञ्चम्यन्तं, कर्त्रभिप्राये सप्तम्यन्तं,

क्रियाफले सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में भी भूवादयो धातवः से धातवः प्रथमान्त पद को पञ्चमी एकवचन में बदल कर धातोः की अनुवृत्ति की जाती है।

जिस धातु में स्वरित की या जकार की इत्संज्ञा हुई हो, उस धातु से आत्मनेपदसंज्ञक प्रत्यय होता है यदि क्रिया का फल कर्ता को प्राप्त हो रहा हो तो, (अन्यथा परस्मैपद का प्रयोग होता है)।

इस सूत्र के प्रसंग में आने वाले धातुओं को उभयपदी कहा जाता है। क्रिया का जो मुख्य उद्देश्य (जिसकी सिद्धि के लिए क्रिया की जा रही हो) उसे क्रियाफल कहा जाता है। अतः क्रिया का फल यदि कर्ता को मिल रहा हो तो आत्मनेपद, नहीं तो परस्मैपद का विधान इस सूत्र से हुआ। जैसे पच्-धातु का (भात, दाल आदि) पकाना अर्थ है। यदि पकाने वाला पाचक अपने लिए पका रहा है अर्थात् पाचनक्रिया का फल(प्रयोजन) उसे ही मिल रहा है तो पच्-धातु से आत्मनेपद का प्रयोग होकर पचते बनेगा और यदि दूसरों के लिए पका रहा है अर्थात् पाचनक्रिया का फल किसी अन्य को मिलने वाला है तो परस्मैपद का प्रयोग होकर पचति बनेगा। आत्मने (पदम्) अर्थात् अपने लिए और परस्मै (पदम्) अर्थात् दूसरे के लिए ऐसा अन्वर्थ(कर्ता के अनुसार की जाने वाले) संज्ञा समझनी चाहिए।