अनुदात्तेतो ङितश्च धातोरात्मनेपदं स्यात्।
३७८- अनुदात्तङ्कित आत्मनेपदम्। अनुदात्तश्च ङ् च अनुदात्तङ्गै, तौ इतौ यस्य सः- अनुदात्तङ्कित, तस्मात् अनुदात्तङ्कितः। अनुदात्तङ्कितः पञ्चम्यन्तम्, आत्मनेपदं प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में भूवादयो धातवः से धातवः प्रथमान्त पद को पञ्चमी एकवचन में बदल कर धातोः की अनुवृत्ति की जाती है।
अनुदात्त-इत्संज्ञक धातु और ङकार-इत्संज्ञक धातुओं से आत्मनेपदसंज्ञक प्रत्यय होते हैं।
छात्रों को लः परस्मैपदम्, तङ्गनावात्मनेपदम् और अनुदात्तङ्कित आत्मनेपदम्, स्वरितजित कर्त्रभिप्राये क्रियाफले, शेषात्कर्तरि परस्मैपदम् इन सूत्रों का अन्तर स्पष्ट रूप से समझना चाहिए। पहले के दो सूत्र परस्मैपद और आत्मनेपद किसे कहते हैं, यह बताने के लिए अर्थात् परस्मैपदसंज्ञा और आत्मनेपदसंज्ञा करने के लिए हैं। बाद के अनुदात्तङ्कितः आदि सूत्र उन परस्मैपदसंज्ञक तिप्, तस् आदि और आत्मनेपदसंज्ञक त, आताम् आदि के विधान के लिए हैं। अर्थात् पहले के दो सूत्र संज्ञासूत्र हैं और बाद के दो सूत्र विधिसूत्र हैं।
धातुपाठ में पाणिनि जी ने इसी प्रयोजन के लिए ही धातुओं में अनुबन्ध लगाया है। जिस धातु में ङकार या अनुदात्त स्वर वाला वर्ण अनुबन्ध लगा हो (अनुबन्ध तो इत्संज्ञा और लोप के लिए होता है, अतः उनकी इत्संज्ञा हुई हो) ऐसे अनुदात्तेत् और ङित् धातुओं से आत्मनेपद अर्थात् तङ्-प्रत्याहार वाले त, आताम्, झ आदि का ही प्रयोग करना चाहिए। इस सूत्र के प्रसंग में आने वाले धातुओं को आत्मनेपदी धातु कहा जाता है। अर्थात् जिन धातुओं से आत्मनेपद का विधान हो, ऐसी धातुएँ आत्मनेपदी और जिन धातुओं से परस्मैपद का विधान हो, ऐसी धातुएँ परस्मैपदी तथा जिन धातुओं से आत्मनेपद और परस्मैपद दोनों का विधान होता है ऐसी धातुएँ उभयपदी मानी जाती हैं।