तङ्प्रत्याहारः शानच्कानचौ चैतत्संज्ञाः स्युः। पूर्वसंज्ञाऽपवादः।
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३७७- तङ्गनावात्मनेपदम्। तङ् च आनश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वः- तङ्गनौ। तङ्गनौ प्रथमान्तम्, आत्मनेपदं प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में लः परस्मैपदम् से लः की अनुवृत्ति आती है।
तङ् प्रत्याहार और शानच्-कानच् प्रत्यय आत्मनेपदसंज्ञक होते हैं।
इस सूत्र में आन शब्द से शानच् और कानच् प्रत्ययों का बोध होता है क्योंकि दोनों में शकार और ककार की इत्संज्ञा करने पर आन ही शेष रहता है। शानच् और कानच् ये दोनों कृत्प्रकरण में होने वाले प्रत्यय हैं, इनकी आत्मनेपदसंज्ञा करने से आत्मनेपद के निमित्त वाले अनुदात्तेत् ङित् आदि धातुओं से ये प्रत्यय होते हैं। तङ् अर्थात् त, आताम् वाले त से महिङ् के ङकार को लेकर माना गया नौ आदेशों वाला प्रत्याहार। लः परस्मैपदम् से अठारहों की परस्मैपदसंज्ञा प्राप्त थी तो इस सूत्र ने उसे बाधकर यह नियम कर दिया कि उन अठारह आदेशों में से द्वितीय जो नौ तङ् प्रत्याहार में आने वाले आदेश हैं, उनकी तो आत्मनेपदसंज्ञा होगी। इस प्रकार द्वितीय नवक की आत्मनेपदसंज्ञा हो जाने के बाद शेष जो प्रथम नवक तिप् से मस् तक के आदेश हैं, इनकी पूर्वसूत्र से परस्मैपदसंज्ञा हो जायेगी। इस प्रकार से अठारह तिप् तस् आदि आदेशों को दो भागों में बाँटा गया। तिप्, तस्, झि, सिप्, थस्, थ, मिप्, वस्, मस्, ये नौ परस्मैपदसंज्ञक और त, आताम्, झ, थास्, आथाम्, ध्वम्, इट्, वहि, महिङ् ये नौ आत्मनेपदसंज्ञक हो गये। यद्यपि ये सब लकार के स्थान पर होने वाले
आदेश हैं तथापि धातुओं से विहित लकार को प्रत्यय माना गया है। अतः स्थानिवद्भाव से या प्रत्ययः सूत्र के अधिकार में आने से ये प्रत्यय भी कहलाते हैं। इसलिए आगे इनका तिबादि प्रत्ययों के रूप में व्यवहार किया जायेगा।
अब कैसे धातुओं से परस्मैपदसंज्ञक प्रत्ययों का विधान हो और कैसे धातुओं से आत्मनेपदसंज्ञक प्रत्ययों का? इसका निर्णय आगे के सूत्रों से किया जा रहा है।