Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
Show
VṛttiGovind
LSK 375
लकारादेशविधायकं विधिसूत्रम्
तिप्तस्झिसिप्थस्थमिब्वस्मस् तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिङ्
Aṣṭādhyāyī 3.4.78
Vṛtti Varadarājācārya

एतेऽष्टादश लादेशाः स्युः।

.....

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

३७५- तिप्तस्झिसिप्थस्थमिब्वस्मस्तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिड्। तिप् च तश्च, झिश्च, सिप् च, थश्च, थश्च, मिप् च, वश्च, मश्च, तश्च, आताञ्च, झश्च, थश्च, आथाञ्च, ध्वञ्च, इट् च, वहिश्च, महिड् च, तेषां समाहारद्वन्द्वः तिप्तस्झिसिप्थस्थमिब्वस्मस्-तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिड्। सम्पूर्णं प्रथमान्तम् एकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में लस्य और प्रत्ययः का अधिकार है।

लकार के स्थान पर तिप्, तस्, झि, सिप्, थस्, थ, मिप्, वस्, मस्, त, आताम्, झ, थास्, आथाम्, ध्वम्, इट्, वहि, महिड् ये अठारह आदेश होते हैं।

दसों लकारों के स्थान पर ये अठारह आदेश के रूप में होंगे। इनमें से तिप्, सिप्, मिप् में पकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है और इट् में टकार की एवं महिड् में डकार

की। इत्संज्ञक वर्ण का तस्य लोपः से लोप होता है। तस्, थस्, वस्, मस् और थास् के सकार की तथा आताम्, आथाम्, ध्वम् में मकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा तो प्राप्त होती है किन्तु न विभक्तौ तुस्माः उसका निषेध कर देता है। अन्य किसी वर्ण की तो इत्संज्ञा प्राप्त ही नहीं है।

पकार की इत्संज्ञा पित् को मानकर होने वाले कार्य= स्वरविधान, गुण आदि के लिए और ङकार की इत्संज्ञा ङित् को मानकर होने वाले कार्य के लिए है। इट् में टकार स्पष्ट समझने के लिए पढ़ा गया है, अन्य कोई प्रयोजन नहीं है। महिङ् में ङकार तिङ् और तङ् प्रत्याहार के लिए पढ़ा गया है।