वर्तमानक्रियावृत्तेर्धातोर्लट् स्यात्। अटावितौ। उच्चारणसामर्थ्याल्लस्य नेत्वम्।
भू सत्तायाम्॥१॥
कर्तृविवक्षायां भू ल् इति स्थिते।
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३७४- वर्तमाने लट्। वर्तमाने सप्तम्यन्तं, लट् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। तिङन्त में प्रत्यय
करने वाले सभी सूत्रों में धातोः का अधिकार है तो इस सूत्र में भी धातोः का अधिकार है। प्रत्ययः, परश्च का अधिकार भी चल रहा है।
वर्तमान कालिक क्रिया से युक्त अर्थात् वर्तमान काल की क्रिया को जब धातु प्रकट करती है, तब उस अर्थ में धातु से लट् लकार होता है।
वैयाकरणों का मानना है कि धातु ही भूत, वर्तमान और भविष्यत् अर्थ को कहता है, लकार तो उस अर्थ को द्योतित करने के लिए आते हैं। इसीलिए वर्तमानेऽर्थे धातोर्लट् भवति ऐसा न कहकर वर्तमानक्रियावृत्तेर्धातोर्लट् ऐसा वृत्ति में कहा गया। इसी प्रकार अन्य लकारों के विषय में भी समझना चाहिए।
लट् में टकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा तथा अकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा और दोनों का तस्य लोपः से लोप होगा। केवल ल् बचेगा। उच्चारण किये जाने के कारण लकार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा नहीं होगी, अन्यथा विधान ही व्यर्थ हो जायेगा।
भू धातु सत्ता अर्थ में है। अपने आपको धारण करने का नाम सत्ता है। राम होता है इस वाक्य में राम अपने स्थिति को धारण कर रहा है यह तात्पर्य निकलता है। सत्ता भी एक प्रकार की क्रिया ही है। भ्वादिगण में पठित और क्रियावाचक होने के कारण भू की भूवादयो धातवः से धातुसंज्ञा होती है।
जिस प्रथम क्षण से आरम्भ होकर कोई कार्य जिस अन्तिम क्षण में समाप्त होता है, उस समग्र काल को वर्तमान काल कहते हैं। जैसे रामः पचति(राम पकाता है।) में राम आग जलाता है, बरतन को चूल्हे पर रखता है, पानी गरम करता है, उसमें चावल डालता है, करछुल से हिलाता है, चावल के गले व अधगले का निश्चय करने के लिए बार-बार थोड़ा-थोड़ा निकालकर अंगुलियों से मसल कर परीक्षा करता है तथा सिद्ध हो जाने पर बरतन को चूल्हे से नीचे उतारता है। राम की इन सभी क्रियाओं को पकाता है इस एक ही क्रिया से व्यवहार करते हैं। इतनी सारी क्रियायें वर्तमान काल में ही आती हैं।