लकाराः सकर्मकेभ्यः कर्मणि कर्तरि च स्युरकर्मकेभ्यो भावे कर्तरि च।
श्रीधरमुखोल्लासिनी
अब आप तिङन्त में प्रवेश कर रहे हैं। जैसे सुष्+अन्त=सुबन्त होता है, वैसे ही तिङ्+अन्त=तिङन्त है। जैसे अजन्तपुँल्लिङ्ग से हलन्तनपुंसकलिङ्ग तक सुबन्त कहलाता है, उसी प्रकार भ्वादिप्रकरण से लेकर लकारार्थप्रकरण तक तिङन्त कहलाता है। तिङ् भी एक प्रत्याहार है जो तिष् के ति से शुरू करके महिङ् के ङकार को लेकर बना है। तिङ् प्रत्याहार में अठारह प्रत्यय हैं। जिनका क्रमशः वर्णन हम आगे करेंगे।
धातुओं का यह प्रकरण संस्कृतव्याकरण का प्राण है। धातुओं से ही क्रियारूपों और कृदन्तरूपों की रचना होती है। माना यह जाता है कि संस्कृतजगत में जितने भी शब्द हैं, वे सब धातुओं से ही बने हैं। अतः छात्रों को यदि विद्वान् बनना हो या संस्कृत भाषा को आत्मसात् करना हो तो तिङन्तप्रकरण को पूर्णतः कण्ठाग्र कर लेना चाहिए। जिस छात्र की इस प्रकरण में जितनी गति होगी उसका संस्कृत-भाषा पर उतना ही अधिकार होगा। यह प्रकरण अन्य प्रकरणों की अपेक्षा कठिन है फिर भी आपको घबराने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि हम आपको साथ हैं। इस ग्रन्थ के नामानुसार हम सरल से सरल तरीके से आपको समझायेंगे किन्तु आपको धैर्य धारण करना होगा एवं ज्ञान के लिए कटिबद्ध बने रहना होगा।
वैसे भी हमने व्याख्या की जो शैली अपनायी है, वह वास्तव में लिखने की व्याख्यात्मक शैली नहीं है अपितु २७ वर्ष तक व्याकरण पढ़ाने का जो अनुभव है, जिस प्रकार से छात्र समझ सकता है, उस पाठन शैली को लिपिबद्ध किया है। अतः यह ग्रन्थ उन विद्वानों के लिए नहीं है जो व्याकरणशास्त्र का ज्ञान कर चुके हैं। उन्हें यहाँ पर नूतन कुछ भी नहीं मिलेगा, क्योंकि हमने उन छात्रों के लिये यह लिखा है जो कि जो सरलता से लघुसिद्धान्तकौमुदी या वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी में प्रविष्ट नहीं हो पाते हैं। उनका मित्र बनकर व्याकरण-शास्त्र की प्रारम्भिक बातें उनके मस्तिष्क में बैठा सकूँ, जो मेरे शिष्यत्व में अध्ययन कर रहे हैं या करने के लिए आते हैं। यदि इससे अन्य लोगों को भी
.....
लाभ मिला तो मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा। हाँ, नूतन जिज्ञासु छात्रों के लिए यह मेरी सरल प्रक्रिया है। अतः उन्हें तो इसमें पूर्ण आशावान् होना चाहिए और धैर्यता पूर्वक पूरा ग्रन्थ पढ़ लेना चाहिए। आइए, अब तिङन्त प्रकरण की बात करते हैं। एक बात यहाँ पर यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि पूर्ववर्ती व्याख्याताओं ने हिन्दी में धातु-शब्द का प्रयोग स्त्रीलिङ्ग में किया है किन्तु मैंने संस्कृत भाषा की तरह पुँल्लिङ्ग और हिन्दी की तरह स्त्रीलिङ्ग दोनों लिङ्गों में ही प्रयोग किया है।
तिङन्त पद क्रियापद है। इसमें तीन भाग होंगे- १- धातु, २- तिङ् प्रत्यय और ३- धातु और प्रत्ययों के बीच में होने वाले शप् आदि विकरण प्रत्यय। जैसे पाणिनि ने सूत्रपाठ अष्टाध्यायी के रूप में बनाया है, उसी प्रकार धातुपाठ भी बनाया है और धातुओं का सामान्य अर्थ भी बताया है। कई आचार्यों का मत है कि धातु के अर्थ पाणिनि जी के द्वारा निर्मित नहीं है अपितु भीमसेन नामक किसी विद्वान् ने जोड़ा है। धातुपाठ को दस भागों में विभाजित किया है। १. भ्वादिगण, २. अदादिगण, ३. जुहोत्यादिगण, ४. दिवादिगण, ५. स्वादिगण, ६. तुदादिगण, ७. रुधादिगण, ८. तनादिगण, ९. क्र्यादिगण और १०. चुरादिगण।
यहाँ सर्वप्रथम भ्वादिगण से प्रारम्भ कर रहे हैं। दसों गणों में तिङ् ही प्रत्यय लगेंगे। तिङ् यद्यपि आदेश हैं फिर भी धातुओं से होने वाले जो लट् आदि लकार के रूप में प्रत्यय हैं, उनके स्थान पर होने के कारण स्थानिवद्भाव से या प्रत्ययः सूत्र के अधिकार में पठित होने के कारण भी प्रत्यय ही कहलाते हैं। लट्, लिट् आदि जो प्रत्यय हैं इनमें अनुबन्धलोप होकर केवल ल् मात्र शेष बचता है, अतः इन्हें लकार भी कहा जाता है। इनमें से पाँचवाँ लेट्-लकार केवल वेद में प्रयुक्त होता है, लौकिक संस्कृत साहित्य में नहीं। लट्, लिट्, लृट्, लृट्, लेट्, लोट् इन ६ लकारों में टकार की इत्संज्ञा होती है। अतः ये टित् लकार हैं और टित् को मानकर जो भी कार्य होगा वह इन्हीं लकारों के विषय में होगा। लङ्, लिङ्, लुङ् और लृङ् इनमें ङकार की इत्संज्ञा होती है, अतः ये ङित् लकार हैं। ङित् को मानकर होने वाले कार्य इन्हीं लकारों में होंगे।
ये लकार भिन्न-भिन्न अर्थों को लेकर होते हैं, उनमें से मुख्यतया तो काल अर्थात् समय के आधार पर ही हैं। जैसे वर्तमान काल के लिए लट् लकार, भूतकाल के लिए लिट्, लङ् और लृङ् लकार और भविष्यत्काल के लिए लृट् और लृट् लकार हैं। लेट् लकार तो वेद का विषय है। शेष लोट् लकार और लिङ् लकार आज्ञा आदि अर्थ में तथा लृङ् लकार क्रियातिपत्ति अर्थात् क्रिया की असिद्धि अर्थ में होते हैं।
धातु से लकार होंगे और लकार के स्थान पर तिङ् प्रत्यय होंगे। तिङ् भी अठारह हैं- तिप्, तस्, झि, सिप्, थस्, थ, मिप्, वस्, मस्, त, आताम्, झ, थास्, आथाम्, ध्वम्, इट्, वहि, महिङ्। अठारह में से नौ-नौ करके दो भागों में बँटे हैं। प्रथम नौ परस्मैपदी हैं और दूसरे नौ आत्मनेपदी हैं। इनका भी विवरण आगे देखेंगे।
धातु और तिप्, तस् आदि प्रत्ययों के बीच में आने वाले जो प्रत्यय हैं, उन्हें विकरण कहते हैं। उनमें से भ्वादिगण में शप्, अदादि में शप् होकर शप् का लुक्, जुहोत्यादि में शप् होकर शप् का श्लु, दिवादि में श्यन्, स्वादि में श्नु, तुदादि में श, रुधादिगण में श्नम्, तनादि में उ, क्र्यादि में श्ना और चुरादि में णिच् प्रत्यय होकर शप् होते हैं।
धातुओं को सकर्मक और अकर्मक इन दो भागों में बाँटा गया है। सकर्मक और अकर्मक के लक्षण और परिभाषा के विषय में आगे जाकर इससे बड़े ग्रन्थों में विशेष वर्णन
.....
आता है। हम यहाँ लघुसिद्धान्तकौमुदीस्तरीय छात्रों को सरलता से बोध कराने के लिए इतना बता रहे हैं कि जिस धातु अर्थात् क्रिया के साथ कर्म लग सकता है, वह धातु सकर्मक और जिस धातु अर्थात् क्रिया के साथ कर्म लग ही नहीं सकता है, वह धातु अकर्मक है। जैसे- रामः पठति (राम पढ़ता है) में राम क्या पढ़ता है? रामः व्याकरणं पठति में पठति क्रिया के साथ व्याकरणम् यह कर्म लगा। अतः पठ धातु सकर्मक है। इसी प्रकार रामः शेते (राम सोता है) में राम क्या सोता है? यह प्रश्न भी नहीं बनता है और उत्तर भी क्या दें? राम क्या सोता है? कोई उत्तर नहीं। कर्म लगने की योग्यता ही नहीं है। अतः सोने के अर्थ वाला शी यह धातु अकर्मक है। इसी प्रकार आप समस्त धातुओं के वाक्य बनाकर प्रयोग करना। आपको सकर्मक और अकर्मक का ज्ञान हो जायेगा।
इससे ज्यादा समझने के लिए सकर्मक और अकर्मक का मुख्य अर्थ समझना पड़ेगा। धातु के दो अर्थ हैं- फल और व्यापार। जैसे रामः पचति में पच् धातु है। इसमें पकाने का सारा कार्य जैसे चावल धोना, पकाने वाले बरतन में रखना, आग जलाना, चूल्हे पर रखना, करछूल से चलाना, बीच-बीच में पका कि नहीं यह जानने के लिए चावल के दानों को देखना, पानी ज्यादा हो तो निकाल देना और बरतन को चूल्हे से नीचे उतारने तक की सारी क्रियायें पच् धातु का व्यापार है। क्रिया को ही व्यापार कहते हैं और उस व्यापार का जो परिणाम है उसे फल कहा जाता है। जैसे- पकाने रूप व्यापार का फल चावल में कोमलता, नरमपन आना आदि है, जिसे विक्लिति कहा जाता है। इसी तरह सभी धातुओं के दो-दो अर्थ होते हैं- फल और व्यापार। व्यापार हमेशा कर्ता के अधीन रहता है अर्थात् कर्ता के आश्रय में रहता है और फल कभी कर्म के अधीन तो कभी कर्ता के। सकर्मक धातुओं में व्यापार कर्ता में और फल कर्म में रहता है तो अकर्मक धातुओं में व्यापार और फल दोनों कर्ता में ही आश्रित रहते हैं, क्योंकि अकर्मक धातुओं में कर्म होता ही नहीं। देवदत्तः तण्डुलान् पचति इस वाक्य में सम्पूर्ण क्रिया देवदत्त में निहित है और फल जो नरमपन है, वह कर्म अर्थात् तण्डुल(चावल) में रहता है। अतः कहा जाता है कि फलाश्रयः कर्म और व्यापाराश्रयः कर्ता।
कहीं-कहीं फल और व्यापार को इस प्रकार से अलग-अलग में आश्रित नहीं दिखा सकते। जैसे- रामः शेते। राम सोता है, इस वाक्य में सोने का सारा कार्य राम कर रहा है इस लिए व्यापार राम के अधीन है किन्तु फल किस में है? किसी अन्य में? नहीं। शयन का जो फल है, वह भी राम में ही निहित है। ऐसे धातुओं को अकर्मक कहते हैं।
सकर्मक धातुओं का लक्षण है- फलव्यधिकरणव्यापारवाचकत्वं सकर्मकत्वम् अर्थात् जिस धातु का फल और व्यापार भिन्न भिन्न अधिकरण में रहता है, वह धातु सकर्मक है। तात्पर्य यह है कि जिन धातुओं के फल और व्यापार के आश्रय भिन्न-भिन्न हों, वे धातु सकर्मक कहलाते हैं। जैसे- देवदत्तः तण्डुलान् पचति में व्यापार देवदत्त में आश्रित है और फल तण्डुल में।
अकर्मक धातुओं का लक्षण- फलसमानाधिकरणव्यापारवाचकत्वमकर्मकत्वम् अर्थात् जिस धातु का फल और व्यापार एक ही अधिकरण में रहता है, वह धातु अकर्मक है। तात्पर्य यह है कि जिन धातुओं के फल और व्यापार का आश्रय एक ही हो, वे धातु अकर्मक कहलाते हैं। जैसे- रामः शेते अर्थात् राम सोता है। इस वाक्य में व्यापार और फल एक ही व्यक्ति राम में आश्रित है। अतः शी (शेते) धातु अकर्मक है। अकर्मक
धातुओं की सामान्यतया पहचान के लिए एक पद्य प्रचलित है-
लज्जा-सत्ता-स्थिति-जागरणं, वृद्धि-क्षय-भय-जीवित-मरणम्।
शयन-क्रीडा-रुचि-दीप्त्यर्थं धातुगणं तमकर्मकमाहुः॥
लज्जा, सत्ता, स्थिति, जागरण, वृद्धि, नाश, भय, जीना, मरना, सोना, खेलना, रुचि और दीप्ति अर्थ वाले धातुओं को आचार्यों ने अकर्मक माना है। यह सामान्यतः कथन है। इसके अलावा भी हस्(हँसना), वृष्(बरसना) आदि अनेक धातुएँ अकर्मक हैं।
पूरे तिङन्तप्रकरण में प्रत्ययों का जहाँ भी विधान हो रहा हैं, वहाँ धातोः इस सूत्र का अधिकार है। अतः सारे प्रत्यय धातु के बाद हीं होंगे।
३७३- लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः। न विद्यते कर्म येषां तेऽकर्मकास्तेभ्यः। लः प्रथमान्तं, कर्मणि सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, भावे सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदम्, अकर्मकेभ्यः पञ्चम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में कर्तरि कृत् से कर्तरि की अनुवृत्ति आती है। चकारात् कर्तरि पद का अनुकर्षण भी होता है। इस तरह अर्थ में कर्तरि पद का दो बार प्रयोग होता है।
सकर्मक धातुओं से कर्ता और कर्म अर्थ में एवं अकर्मक धातुओं से भाव और कर्ता अर्थ में लकार होते हैं।
इस सूत्र का अर्थ करते समय इसके दो भाग करते हैं। एक भाग का अर्थ यह है कि सकर्मक धातुओं से लकार कर्म और कर्ता अर्थ में हों और दूसरे भाग का अर्थ यह है कि अकर्मक धातुओं से लकार कर्ता और भाव अर्थ में हों। जब धातुओं को सकर्मक और अकर्मक के रूप में दो भागों में बाँटा गया तो उसका पहला फल यही है कि सकर्मक धातुओं से लकार का विधान हो तो वे लकार कर्ता और कर्म अर्थ को लेकर के ही आयेंगे और अकर्मक धातुओं से लकार का विधान हो तो वे लकार कर्ता और भाव अर्थ को लेकर के ही आयेंगे। जो प्रत्यय जिस अर्थ में होते हैं, वे उसी अर्थ को दर्शाते हैं। यहाँ पर इस सूत्र से लकार कर्ता, कर्म और भाव अर्थ में हो रहे हैं तो उनके स्थान पर होने वाले जो भी तिङ् आदेश हैं, उनके भी कर्ता, कर्म और भाव अर्थ ही होंगे। इसी प्रकार से जिस काल अर्थात् समय-विशेष को आधार मानकर लकार का विधान होगा। वे लकारादेश तिङ् प्रत्यय उन्हीं कालों को दर्शायेंगे। आगे जाकर वचनों में इनका विभाजन होगा तो लकार का अर्थ वचन अर्थात् संख्या भी माना जायेगा। इस प्रकार से लकार के अर्थ हुए- कर्ता, कर्म या भाव, संख्या और काल।
सकर्मक-धातुओं से कर्ता-अर्थ में प्रत्यय होने पर कर्तृवाच्य के और कर्म अर्थ में प्रत्यय होने पर कर्मवाच्य के वाक्य बनेंगे। इसी प्रकार अकर्मक-धातुओं से भी कर्ता-अर्थ में प्रत्यय होने पर कर्तृवाच्य और भाव अर्थ में प्रत्यय होने पर भाववाच्य वाले वाक्य बनते हैं।