असंयोगोपधमुपसर्जनं यत्स्वाङ्गं तदन्ताददन्तात् डीष् वा स्यात्।
केशानतिक्रान्ता अतिकेशी, अतिकेशा। चन्द्रमुखी, चन्द्रमुखा।
असंयोगोपधात् किम्? सुगुल्फा। उपसर्जनात् किम्? शिखा।
१२६५- स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात्। स्वम् अङ्गं स्वाङ्गं, तस्मात्। संयोगः उपधा यस्य स संयोगोपधः, न संयोगोपधः असंयोगोपधस्तस्मात्। स्वाङ्गात् पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदम्, उपसर्जनात् पञ्चम्यन्तम्, असंयोगोपधात् पञ्चम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। अन्यतो डीष् से डीष् की अनुवृत्ति आती है और अतः, प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च, स्त्रियाम् का अधिकार है।
उपधा में संयोग न हो ऐसे उपसर्जनसंज्ञक स्वाङ्गवाची शब्द अन्त में हो ऐसे अदन्त प्रातिपदिकों से स्त्रीत्व की विवक्षा में विकल्प से डीष् प्रत्यय होता है।
स्वाङ्ग-शब्द का यहाँ पर अपना अंग ऐसा अर्थ नहीं है अपितु पारिभाषिक अर्थ है। महाभाष्यकार ने इसके तीन लक्षण बताये हैं-
अद्रवं मूर्तिमत्स्वाङ्गं प्राणिस्थमविकारजम्।
अतस्थं तत्र दृष्टं च, तेन चेत्तत्तथायुतम्।
१- पहला स्वाङ्ग- अद्रव अर्थात् जो तरल न हो, मूर्तिमत्- अर्थात् साकार हो, प्राणिस्थ- प्राणियों में स्थित हो और अविकारज- जो विकार से उत्पन्न न हो। वह एक प्रकार का स्वाङ्ग होता है। इस लक्षण के अनुसार जब प्राणी के अङ्ग प्राणी में ही हों, तब वह स्वाङ्ग कहलाता है।
२- अतस्थम्- अभी उस प्राणी में नहीं रहता हो, पर तत्र दृष्टम्- कभी उस प्राणी में दिखाई दिया हो तो वह भी स्वाङ्ग कहलाता है। जैसे- प्राणी के अङ्ग केश आदि यदि गली में पड़े हों तो प्राणी में न रहते हुए भी अर्थात् गली में रहते हुए भी कभी पहले प्राणी में स्थित थे तो उस समय वहाँ उसमें दिखाई देने के कारण इस दूसरे लक्षण का विषय बन सकता है।
३- तेन चेत्तत्तथायुतम्- जैसे वह स्वाङ्ग प्राणी में होता है, वैसे ही अन्यत्र भी हो तो भी वह स्वाङ्ग कहलाता है। इस लक्षण के अनुसार मूर्तियों में वर्तमान अङ्ग भी प्राणी में स्थित अङ्ग के समान होने से तीसरा स्वाङ्ग सिद्ध होता है।
केशानतिक्राता अतिकेशी, अतिकेशा। केशों को लांघने वाली लम्बी माला आदि। अतिकेश शब्द में उपधा में संयोग नहीं है, केश प्रथम लक्षण के अनुसार स्वाङ्गवाची है और वह अन्त में भी है ऐसे अतिकेश शब्द से स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात् इस सूत्र के द्वारा डीष् होकर स्वादिकार्य करने पर अतिकेशी बनता है। डीष् न होने के पक्ष में टाप् होकर अतिकेशा बन जाता है।
चन्द्रमुखी, चन्द्रमुखा। चन्द्र के समान मुख वाली। चन्द्रमुख शब्द में उपधा में संयोग नहीं है, मुख भी प्रथम लक्षण के अनुसार स्वाङ्गवाची है और वह अन्त में भी है ऐसे चन्द्रमुख शब्द से स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात् इस सूत्र के द्वारा डीष् होकर स्वादिकार्य करने पर चन्द्रमुखी बनता है। डीष् न होने के पक्ष में टाप् होकर चन्द्रमुखा बन जाता है।
असंयोगोपधात् किम्, सुगुल्फा। यदि स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात् में असंयोगोपधात् न पढ़ते तो स्वाङ्गवाची संयोगोपध सुगुल्फ आदि शब्दों से भी एक पक्ष में डीष् होकर सुगुल्फी ऐसा अनिष्ट शब्द सिद्ध होने लगता। यहाँ पर टाप् हुआ है।
उपसर्जनात् किम्? शिखा। यदि स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात् इस सूत्र में उपसर्जनात् इतना पद न रखते तो स्वाङ्गवाची अनुपसर्जन शिखा आदि शब्दों से भी एक पक्ष में डीष् होकर शिखी ऐसा अनिष्ट शब्द सिद्ध होने लगता।