द्व्यजेवावरं न्यूनं न तु ततो न्यूनमनेकाजिति यावत्।
तादृशमर्धं यस्य तस्माद् डाच् स्यात् कृभ्वस्तिभिर्योगे।
वार्तिकम्- डाचि विवक्षिते द्वे बहुलम्। इति डाचि विवक्षिते द्वित्वम्।
वार्तिकम्- नित्यमाम्रेडिते डाचीति वक्तव्यम्।
डात्परं यदाम्रेडितं तस्मिन् परे पूर्वपरयोर्वर्णयोः पररूपं स्यात्।
इति तकारपकारयोः पकारः। पटपटाकरोति।
अव्यक्तानुकरणात् किम्? ईषत्करोति। द्व्यजवरार्धात् किम्? श्रत्करोति।
अवरेति किम्? खरटखरटाकरोति। अनितौ किम्? पटिति करोति।
इति स्वार्थिकाः॥५१॥
इति तद्धिताः।
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१२४७. अव्यक्तानुकरणाद्द्व्यजवरार्धादनितौ डाच्। यत्र ध्वनौ अकारादयो वर्णा न व्यज्यन्ते सोऽव्यक्तो ध्वनिः। अव्यक्तध्वनेरनुकरणम् अव्यक्तानुकरणं, तस्मात्। द्वयोरचोः समाहारः द्वयच्, द्वयच् एव अवरं न्यूनं, द्व्यजवरं, तस्मात्। न इतिः अनितिः, तस्मिन्, अनितौ। मण्डूकप्लुति से
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कृश्वस्तियोगे सम्पद्यकर्तरि च्चिः से कृश्वस्तियोगे की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, उच्याप्रातिपदिकात्, तद्धिताः का अधिकार है।
जिसके आधे भाग में कम से कम दो अच् हों, ऐसे अव्यक्तानुकरण अर्थात् स्पष्टतया अकारादि वर्ण की ध्वनि जहाँ पर न हो ऐसे शब्द के अनुकरण होने पर उससे डाच् प्रत्यय होता है यदि कृ, भू, अस् का योग हो तो किन्तु इति शब्द परे नहीं होना चाहिए।
इस सूत्र के लगने में प्रथमतः अव्यक्त ध्वनि की नकल होनी चाहिए, दूसरी बात जिस शब्द से डाच् किया जा रहा है, उस शब्द में कम से कम दो अच् होने चाहिए, तीसरी बात- कृ, भू, अस् का योग होना चाहिए और चौथी बात इति शब्द परे नहीं होना चाहिए।
डाच् में डकार और चकार इत्संज्ञक हैं, आ बचता है। डित् होने के कारण टेः से प्रकृति के टि का लोप किया जाता है।
इस सूत्र में एक वार्तिक पढ़ा गया है- डाचि विवक्षिते द्वे बहुलम् अर्थात् डाच् प्रत्यय करने की विवक्षा हो तो पहले मूल शब्द को बहुल से द्वित्व होता है।
नित्यमाम्रेडिते डाचीति वक्तव्यम्। यह भी वार्तिक है। डाच् परे है जिसके ऐसा जो आम्रेडित, उसके परे होने पर पूर्व और पर के स्थान पर पररूप एक आदेश होता है।
स्मरण रहे कि द्वित्व होने पर द्वितीय की तस्य परमाम्रेडितम् से आम्रेडितसंज्ञा होती है।
पटपटा करोति। पटत् इति शब्दं करोति। पटत् ऐसा शब्द करता है। यहाँ पटत् लगभग इस तरह का शब्द करना, यह अव्यक्त शब्द का अनुकरण है क्योंकि जो आवाज हुई वह पटत् ऐसे व्यक्त शब्द के रूप में न होकर उसके अनुकरण में जैसे ठक् ठक् करता है आदि में अनुकरण किया जाता है, उसी तरह का यह भी अनुकरण ही है। पटत् इससे अतः अव्यक्तानुकरणाद्द्व्यजवरार्थादनितौ डाच् से डाच् की प्रत्यय की विवक्षा है। उसके पहले ही डाचि विवक्षिते द्वे बहुलम् से उसको द्वित्व हुआ- पटत् पटत् करोति बना। अब यहाँ पर आधा भाग भी दो अच् वाला है ही। अतः डाच् प्रत्यय हो गया, अनुबन्धलोप होने के बाद पटत्+पटत्+आ करोति बना। प्रथम पटत् के तकार और द्वितीय पटत् के आदि वर्ण पकार के स्थान पर नित्यमाम्रेडिते डाचीति वक्तव्यम् से पररूप होकर पकार ही बना। पट+प्+अटत्+आ करोति बना। अटत् में अत् टि है, इसका टेः से लोप होकर पट+प्+अट्+आ करोति बना। वर्णसम्मेलन होकर पटपटा करोति बना। डाजन्त भी तद्धितश्चासर्वविभक्तिः से अव्यय बन जाता है। अतः उसके बाद आए हुए सुप् का अव्ययादाप्सुपः से लुक् होकर पटपटा बना। आगे करोति है। इस तरह पटपटा-करोति सिद्ध हुआ।
अव्यक्तानुकरणात् किम्? ईषत्करोति। यदि अव्यक्तानुकरणाद्द्व्यजवरार्थादनितौ डाच् इस सूत्र में अव्यक्तानुकरणात् न कहते तो व्यक्तानुकरण में भी डाच् होने लगाता, जिससे ईषत्करोति नहीं बन पाता।
द्व्यजवरार्थात् किम्? श्रत्करोति। अव्यक्तानुकरणाद्द्व्यजवरार्थादनितौ डाच्
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इस सूत्र में द्वयजवरार्थात् न कहते तो एक अच् वाले में भी उक्त सूत्र प्रवृत्त होता, जिससे श्रत्करोति न बन पाता।
अवरेति किम्? खरटखरटाकरोति। अव्यक्तानुकरणाद्द्वयजवरार्थादनितौ डाच्
इस सूत्र में अवर शब्द न होता तो दो अच् में तो डाच् हो जाता किन्तु दो से अधिक अच्
होने पर भी डाच् नहीं हो पाता जिससे खरटखरटा करोति नहीं बन पाता।
अनितौ किम्? पटिति करोति। अव्यक्तानुकरणाद्द्वयजवरार्थादनितौ डाच्
इस सूत्र में अनिति नहीं कहते तो इति के परे होने पर भी डाच् होने लगता, जिससे पटिति
करोति न बन पाता।
परीक्षा
इस प्रकरण के किन्हीं पन्द्रह प्रयोगों की सूत्र लगाकर सिद्धि दिखाइये।
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
स्वार्थिक-प्रकरण पूर्ण हुआ।
तद्धितप्रकरण समाप्त।
अथ स्त्रीप्रत्ययाः