सस्य षत्वं न स्यात्। कृत्स्नं शस्त्रमग्निः सम्पद्यतेऽग्निसाद्भवति।
दधि सिञ्चति।
१२४५. सात्पदाद्योः। पदस्यादिः पदादिः। सात् च पदादिश्च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वः सात्पदादी, तयोः सात्पदाद्योः। सात्पदाद्योः षष्ठ्यन्तमेकपदं सूत्रम्। सहेः साडः सः से सः और अपदान्तस्य मूर्धन्यः से मूर्धन्यः तथा न रपरसृपिसृजिसृषिसृहिसवनादीनाम् से न की अनुवृत्ति आती है।
साति प्रत्यय के सकार और पदादि में स्थित सकार को मूर्धन्य षकार आदेश नहीं होता है।
अग्निसाद् भवति। कृत्स्नं शस्त्रम् अग्निः सम्पद्यत इति। सम्पूर्ण शस्त्र जो अग्नि नहीं है, वह आग हो जाता है अर्थात् जल जाता है। यहाँ पर सम्पूर्ण अर्थ होने के कारण कात्स्ये है। अभूततद्भाव भी है। जैसे कि जो आग नहीं वह आग हो गया। अतः अग्नि सु भवति में विभाषा साति कात्स्ये से साति प्रत्यय, ईकार का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अग्नि+सात् बना। यहाँ पर इवर्ण से परे होने के कारण
सात्-प्रत्यय के सकार के स्थान पर आदेशप्रत्यययोः से षत्व प्राप्त था, उसका सात्पदाद्योः से निषेध हो गया। अतः अग्निसात् ही रह गया। सातिप्रत्ययान्त अव्यय होता ही है, अतः उससे बाद की विभक्ति का लुक् होकर अग्निसात् सिद्ध हो जाता है। आगे भवति है, अतः तकार को झलां जशोऽन्ते से जश्त्व होकर अग्निसाद् भवति हो जाता है।
दधि सिञ्चति। दही छिड़कता है। यह साति प्रत्यय का विषय नही है अपितु षत्व के निषेध में पदादि का उदाहरण है। दधि में विद्यमान इण् वर्ण इकार से परे सिञ्चति के सकार को आदेशप्रत्यययोः से षकारादेश प्राप्त था, उसका निषेध सात्पदाद्योः से किया गया है। साति प्रत्यय के विधान एवं उसके सकार को षत्वनिषेध के विषय में आगे देखें। १२४६- च्चौ च। च्चौ सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अङ्गस्य का अधिकार है और अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः से दीर्घः की अनुवृत्ति आती है।
च्चि के परे होने पर पूर्व के अङ्ग को दीर्घ होता है।
अग्नीभवति। जो अग्नि नहीं है वह अग्नि बनता है। अग्निः अग्निर्भवति लौकिक विग्रह और अग्नि सु अलौकिक विग्रह में कृभ्वस्तियोगे सम्पद्यकर्तरि च्चिः से च्चि, सर्वापहारलोप होकर प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, अग्नि+भवति बना। च्चौ च से इकार को दीर्घ होकर अग्नीभवति।