वाग्गमी।
११९४- वाचो गिमिनिः। वाचः पञ्चम्यन्तं, गिमिनिः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से तद् अस्य अस्ति अस्मिन् इति इन पदों की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, उच्याप्रातिपदिकात्, समर्थानां प्रथमाद्वा और तद्धिताः का अधिकार है।
‘वाच्’ इस प्रथमान्त प्रातिपदिक से मत्वर्थ में ‘गिमिनि’ प्रत्यय होता है।
गिमिनि में अन्त्य इकार इत्संज्ञक है, गिमन् शेष रहता है।
वाग्गमी। प्रशस्त वाणी वाला, बोलने में चतुर। प्रशस्ता वागस्त्यस्य। वाच् सु से वाचो गिमिनिः से गिमिनि प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके वाच्+गिमन् बना। चकार को चोः कुः से कुत्व होकर ककार बना। उसको झलां जशोऽन्ते से जश्त्व होकर गकार हुआ- वाग्गिमन् बना। इससे स्वादि कार्य करके वाग्गमी, वाग्गिमनौ, वाग्गिमनः आदि रूप बनते हैं। यथार्थ एवं सन्तुलित बोलने वाले को वाग्गमी कहते हैं तो बोलक्कड़ को वाचालः कहते हैं। इसमें आलच् प्रत्यय होता है।