Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 56
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VṛttiGovind
LSK 1193
विनि-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
अस्मायामेधास्रजो विनिः
Aṣṭādhyāyī 5.2.121
Vṛtti Varadarājācārya

यशस्वी। यशस्वान्। मायावी। मेधावी। स्रग्वी।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१११३- अस्मायामेधास्रजो विनि:। अस् च माया च मेधा च स्रज् च तेषां समाहारद्वन्द्व अस्मायामेधास्रज्, तस्मात्। अस्मायामेधास्रजः पञ्चम्यन्तं, विनिः प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् से तद् अस्य अस्ति अस्मिन् इति इन पदों की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, समर्थानां प्रथमाद्वा और तद्धिताः का अधिकार है।

प्रथमान्त असन्त शब्द और माया, मेधा तथा स्रज् शब्दों से मत्वर्थ में विनि प्रत्यय होता है।

विनि में नकारोत्तरवर्ती इकार इत्संज्ञक है, विन् बचता है!

यशस्वी, यशस्वान्। जिसका यश, कीर्ति हो अथवा जिसमें यश, कीर्ति हो अर्थात् यश, कीर्ति वाला। यशः अस्य अस्ति अथवा यशः अस्मिन् अस्ति लौकिक विग्रह और यशस् सु अलौकिक विग्रह है। यह असन्त शब्द है। अस्मायामेधास्रजो विनिः से विनि हुआ। अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके यशस्+विन्=यशस्विन् बना। योगिन् से योगी, योगिनौ, योगिनः की तरह यशस्विन् से यशस्वी, यशस्विनौ, यशस्विनः आदि रूप बनते हैं। मतुप् होने के पक्ष में अवर्णोपध मानकर मकार के स्थान पर वकार आदेश करके यशस्वान्, यशस्वन्तौ, यशस्वन्तः आदि बनाये जाते हैं। स्त्रीलिङ्ग में यशस्विनी, यशस्विन्यौ, यशस्विन्यः आदि रूप बनते हैं।

मायावी। माया वाला, कपटी। माया अस्य अस्ति अथवा माया अस्मिन् अस्ति लौकिक विग्रह और माया सु अलौकिक विग्रह है। अस्मायामेधास्रजो विनिः से विनि हुआ। अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके माया+विन्=मायाविन् बना। सु आदि विभक्ति आने पर मायावी, मायाविनौ, मायाविनः आदि रूप बनते हैं। स्त्रीलिङ्ग में मायाविनी, मायाविन्यौ, मायाविन्यः आदि रूप बनाये जाते हैं।

मेधावी। धारणावती बुद्धि वाला। मेधा अस्य अस्ति अथवा मेधा अस्मिन् अस्ति लौकिक विग्रह और मेधा सु अलौकिक विग्रह है। अस्मायामेधास्रजो विनिः से विनि हुआ। अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके मेधा+विन्=मेधाविन् बना। सु आदि विभक्ति आने पर मेधावी, मेधाविनौ, मेधाविनः आदि रूप बनते हैं। स्त्रीलिङ्ग में मेधाविनी, मेधाविन्यौ, मेधाविन्यः आदि रूप बनाये जाते हैं। इसी प्रकार स्रज् से स्रग्वी, स्रग्विणौ, स्रग्विणः आदि रूप बनाइये।

सग्वी। माला, हार वाला। स्रक् अस्य अस्ति। स्रज् सु में अस्मायामेधास्रजो विनिः से विनि हुआ। अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके स्रज्+विन् बना। स्वादिष्वसर्वनामस्थाने से पदत्व के कारण चोः कुः से कुत्व होकर जकार के स्थान पर गकार होकर स्रग्विन् बना। सु आदि विभक्ति आने पर स्रग्वी, स्रग्विणौ, स्रग्विणः आदि रूप बनते हैं।