Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 55
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VṛttiGovind
LSK 1180
तीय-सम्प्रसारणञ्च विधायकं विधिसूत्रम्
त्रेः सम्प्रसारणं च
Aṣṭādhyāyī 5.2.55
Vṛtti Varadarājācārya

तृतीयः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११८०- त्रेः सम्प्रसारणञ्च। त्रेः षष्ठ्यन्तं, सम्प्रसारणं प्रथमान्तं, चाव्ययपदं त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में द्वेस्तीयः से तीयः की, सङ्ख्याया गुणस्य निमाने मयट् से सङ्ख्यायाःकी और तस्य पूरणे डट् से तस्य, पूरणे की अनुवृत्ति आती है। यहाँ पर त्रि शब्द की द्विरावृत्ति की जाती है सो एक को षष्ठ्यन्त और दूसरे को प्रथमान्त माना जाता है।

त्रि शब्द से पूरण अर्थ में तीय प्रत्यय होता है साथ ही त्रि को सम्प्रसारण भी हो जाता है।

यण् के स्थान पर इक् करने को सम्प्रसारण कहते हैं- इग्यणः सम्प्रसारणम्। त्रिशब्द से तीय प्रत्यय और त्रि के रेफ के स्थान पर सम्प्रसारणसंज्ञक ऋकार आदेश करता है। सम्प्रसारण होने पर सम्प्रसारणाच्च से पूर्वरूप भी होता है।

तृतीयः। तीन संख्या का पूरण अर्थात् तीसरा। त्रयाणां पूरणः लौकिक विग्रह और त्रि आम् अलौकिक विग्रह है। त्रेः सम्प्रसारणञ्च से तीय प्रत्यय और त्+र्+इ=त्रि में जो रेफ, उसके स्थान पर सम्प्रसारणसंज्ञक ऋकार आदेश, त्+ऋ+इ, ऋ+इ में सम्प्रसारणाच्च से पूर्वरूप एकादेश होने पर ऋकार ही हुआ, त्+ऋ=तृ+तीय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, तृतीय बना और सु, रुत्व विसर्ग करने पर तृतीयः सिद्ध हुआ।