Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 52
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VṛttiGovind
LSK 1142
प्रकृतिभावार्थं विधिसूत्रम्
आत्माध्वानौ खे
Aṣṭādhyāyī 6.4.169
Vṛtti Varadarājācārya

एतौ खे प्रकृत्या स्तः।

आत्मने हितम् आत्मनीनम्। विश्वजनीनम्। मातृभोगीणः।

इति छयतोरवधिः॥५२॥

( प्राक्क्रीतीयाः )

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११४२- आत्माध्वानौ खे। आत्मा च अध्वा च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्व आत्माध्वानौ। आत्माध्वानौ प्रथमान्तं, खे सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। प्रकृत्यैकाच् से प्रकृत्या की अनुवृत्ति आती है। ख प्रत्यय के परे रहते आत्मन् और अध्वन् शब्द को प्रकृतिभाव होता है।

नस्तद्धिते से प्राप्त टिलोप के निषेध के लिए प्रकृतिभाव किया जा रहा है।

आत्मनीनम्। अपने लिए हितकारी। आत्मने हितम् लौकिक विग्रह और आत्मन् ङे अलौकिक विग्रह है। आत्मन्विश्वजनभोगोत्तरपदात् खः से ख प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके आत्मन्+ख बना। खकार के स्थान पर ईन् आदेश होकर आत्मन्+ईन बना है। अब नस्तद्धिते से टिसंज्ञक अन् का लोप प्राप्त था, आत्माध्वानौ खे से प्रकृतिभाव हो जाने से वैसे ही रह गया अर्थात् उसका लोप नहीं हुआ। इस तरह आत्मनीन यह प्रातिपदिक बना। स्वादिकार्य करने पर आत्मनीनम् सिद्ध हो जाता है।

विश्वजनीनम्। सबों के लिए हितकारी। विश्वजनेभ्यो हितम् लौकिक विग्रह और विश्वजन भ्यस् अलौकिक विग्रह है। आत्मन्विश्वजनभोगोत्तरपदात् खः से ख प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके विश्वजन+ख बना। खकार के स्थान पर ईन् आदेश होकर विश्वजन+ईन बना है। यस्येति च से भसंज्ञक अकार का लोप, वर्णसम्मेलन और स्वादिकार्य करके विश्वजनीनम् सिद्ध हो जाता है।

मातृभोगीणम्। माता के शरीर के लिए हितकारी आहार आदि। मातृभोगाय हितम् लौकिक विग्रह और मातृभोग ङे अलौकिक विग्रह है। आत्मन्विश्वजनभोगोत्तरपदात् खः से ख प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके मातृभोग+ख बना। खकार के स्थान पर ईन् आदेश होकर मातृभोग+ईन बना है। यस्येति च से भसंज्ञक अकार का लोप, वर्णसम्मेलन और अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि से णत्व होने पर मातृभोगीण बना। स्वादिकार्य करके मातृभोगीणः सिद्ध हुआ।

परीक्षा

इस प्रकरण के दोनों सूत्रों एवं उनके अर्थों पर प्रकाश डालते हुए किन्हीं पाँच प्रयोगों की सिद्धि दिखाइये।

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या

छयतोरधिकार-प्रकरण पूर्ण हुआ।

अथ ठजधिकारः