उपगोरिदम् औपगवम्।
इति शैषिकाः॥४८॥
११०९- तस्येदम्। तस्य षष्ठ्यन्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकम्, इदं प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः, प्राग्दीव्यतोऽण्, समर्थानां प्रथमाद्वा और शेषे का.अधिकार है।
‘उसका है यह’ इस अर्थ में समर्थ षष्ठ्यन्त प्रातिपदिक से अण् आदि प्रत्यय होते हैं।
भागवतम्। भगवान् का है यह। भगवतः इदम् लौकिक विग्रह और भगवत् इत्स् अलौकिक विग्रह है। तस्येदम् से अण् हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, णित् होने के कारण आदिवृद्धि करके अकार के स्थान पर आकार आदेश करके भागवत्+अ=भागवत बना, सु के बाद अम् आदेश, पूर्वरूप करके भागवतम् सिद्ध हुआ।
परीक्षा
१- इस प्रकरण के प्रत्यय एवं उनके अर्थों पर प्रकाश डालिए।
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२- शेषे की उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
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३- वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद् वृद्धम् की उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
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४- कालाट्ठञ् की उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
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५- किन्हीं दस शैषिकों की प्रक्रिया दिखाइये।
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श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
शैषिक-प्रकरण पूर्ण हुआ।
अथ विकारार्थकाः