विदिशाया अदूरभवं नगरं वैदिशम्।
१०५९- अदूरभवश्च। भवतीति भवः, न दूरम् अदूरम्, अदूरे(निकटे) भवः- अदूरभवः। अदूरभवः प्रथमान्तं, चाव्ययपदं द्विपदमिदं सूत्रम्। तद्धिताः, ड्याप्प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च, समर्थानां प्रथमाद्वा आदि का अधिकार बराबर आ रहा है और प्राग्दीव्यतोऽण् से अण् और तस्य निवासः से तस्य की अनुवृत्ति आती है।
यदि प्रकृति और प्रत्यय के समूह से देश का नाम बनता हो तो 'उसके समीप रहने वाला देश' इस अर्थ में षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक से अण् प्रत्यय होता है।
वैदिशम्। विदिशा नामक नगरी से समीप वाला नगर, देश। विदिशाया अदूरभवं नगरम् लौकिक विग्रह और विदिशा डम् अलौकिक विग्रह। अदूरभवश्च से अण् प्रत्यय करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके विदिशा+अ बना। तद्धितेष्वचामादेः से आदि अच् इकार की वृद्धि करके ऐकार आदेश और भसंज्ञक शकारोत्तरवर्ती आकार का लोप करके वैदिश्+अ=वैदिश, सु आदि करके वैदिशम् बना।