क्रमादैजावागमौ स्तः। व्याकरणमधीते वेद वा वैयाकरणः।
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पदान्ताभ्यां यकारवकाराभ्यां परस्य न वृद्धिः, किन्तु ताभ्यां पूर्वो
१०५४- न व्याभ्यां पदान्ताभ्यां पूर्वो तु ताभ्यामैच्। न अव्ययपदं, व्याभ्यां पञ्चम्यन्तं, पदान्ताभ्यां पञ्चम्यन्तं, पूर्वो प्रथमान्तं, तु अव्ययपदं, ताभ्यां पञ्चम्यन्तं, ऐच् प्रथमान्तम् अनेकपदमिदं सूत्रम्।
पदान्त यकार वकार से परे अच् की वृद्धि नहीं होती किन्तु उनसे पूर्व के वर्णों को ऐच् अर्थात् ऐ, औ का क्रमशः आगम होता है।
तद्धितेष्वचामादेः आदि से प्राप्त वृद्धि का निषेध करके ऐच् आगम का विधान करता है। यथासंख्य होने से यकार से पूर्व ऐ और वकार से पूर्व औ होता है। ध्यान रहे कि ये आगम हैं आदेश नहीं और यकार तथा वकार से पूर्व में ही होंगे।
वैयाकरणः। व्याकरण पढ़ने या जानने वाला। व्याकरणम् अधीते वेद वा लौकिक विग्रह और व्याकरण अम् अलौकिक विग्रह है। तदधीते तद्वेद से अण् प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, व्याकरण+अ बना। यहाँ आदि अच् आकार की तद्धितेष्वचामादेः से वृद्धि प्राप्त थी उसे न व्याभ्यां पदान्ताभ्यां पूर्वो तु ताभ्यामैच् से निषेध करके य से पहले ऐ का आगम हुआ- व्+ऐ+याकरण+अ बना। भसंज्ञक अकार का लोप करके वर्णसम्मेलन होने पर वैयाकरण बन गया, सु, रुत्वविसर्ग करके वैयाकरणः सिद्ध हुआ।
ऐच् आगम का अन्य उदाहरण- वैयाघ्रिः। व्याघ्र की सन्तान। व्याघ्रस्य अपत्यं पुमान् लौकिक विग्रह और व्याघ्र इत्स् अलौकिक विग्रह है। अत इञ् से इञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके व्याघ्र+इ बना है। अब यहाँ आदि अच् आकार की तद्धितेष्वचामादेः से वृद्धि प्राप्त थी उसे न व्याभ्यां पदान्ताभ्यां पूर्वो तु ताभ्यामैच् से निषेध करके य से पहले ऐ का आगम हुआ- व्+ऐ+याघ्र+इ बना। भसंज्ञक अकार का लोप करके वर्णसम्मेलन होने पर वैयाघ्रि बन गया, सु, रुत्वविसर्ग करके वैयाघ्रिः सिद्ध हुआ। औ आगम का उदाहरण आगे बतायेंगे।