ऊर्यादयश्च्यन्ता डाजन्ताश्च क्रियायोगे गतिसंज्ञाः स्युः।
ऊरीकृत्य। शुक्लीकृत्य। पटपटाकृत्य। सुपुरुषः।
वार्तिकम्- प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया। प्रगत आचार्यः प्राचार्यः।
वार्तिकम्- अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया। अतिक्रान्तो मालामिति विग्रहे-
१५०- ऊर्यादिच्चिडाचश्च। ऊरी आदियों ते ऊर्यादयः। ऊर्यादयश्च च्चिडाच च तेषामितरतेरद्वन्द्व ऊर्यादिच्चिडाचः। ऊर्यादिच्चिडाचः प्रथमान्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। उपसर्गाः क्रियायोगे से क्रियायोगे और गतिश्च से वचनविपरिणाम करके गतयः की अनुवृत्ति आती है।
ऊरी आदि गणपठित शब्द, च्चि-प्रत्ययान्त शब्द और डाच्-प्रत्ययान्त शब्द क्रिया के योग में गतिसंज्ञक होते हैं।
ऊर्यादिगण में ऊरी, उररी, तन्थी, ताली, आताली, बेताली, धूली, धूसी, शकला, श्रौषट्, वौषट्, वषट्, स्वाहा, स्वधा आदि अनेक शब्द पढ़े गये हैं। कृभ्वस्तियोगे सम्पद्यकर्तरि च्चिः से कृ, भू, अस् धातुओं के योग में च्चि तथा अव्यक्तानुकरणाद् द्व्यजवरार्थादनितौ डाच् से डाच् प्रत्यय होता है। प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् इस परिभाषा के बल पर प्रत्यय के ग्रहण में प्रत्ययान्त का ग्रहण किया जाता है। ऊर्यादि-गणपठित च्चिप्रत्ययान्त और डाच्-प्रत्ययान्त शब्दों की क्रिया के योग में इस सूत्र से गतिसंज्ञा की जाती है। गतिसंज्ञा का फल कुगतिप्रादयः से गतिसमास करना है। समास के बाद कृदन्तप्रकरण में हुए क्त्वा प्रत्यय के स्थान पर ल्यप् आदेश होता है।
ऊरीकृत्य। स्वीकार करके। उरी कृत्वा ऐसा अलौकिक विग्रह है। यहाँ कोई सुप् विभक्ति नहीं है, क्योंकि दोनों पद अव्यय हैं। अतः अव्यय से आये हुए प्रत्ययों का अव्ययादाप्सुपः से लुक् हो गया है। ऊरी गणपाठ का शब्द है और कृत्वा यह कृ धातु से क्त्वा प्रत्यय करके बनाया गया है। कृत्वा के योग में ऊरी की ऊर्यादिच्चिडाचश्च से गतिसंज्ञा करने के बाद कुगतिप्रादयः से समास हो जाता है। तदनन्तर प्रातिपदिकसंज्ञा होती है। सुप् न होने के कारण सुप् के लुक् का प्रसंग नहीं है। ऊरीकृत्वा बन गया है। अब
कृदन्त में समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप् से क्त्वा के स्थान पर ल्यप् आदेश होकर, अनुबन्ध लोप होने के बाद ऊरीकृत्य बन जाता है। प्रथमानिर्दिष्ट ऊरी का ही पूर्वप्रयोग होता है। समास होने के बाद पुनः सु विभक्ति, उसका भी अव्ययत्वेन लुक् करके ऊरीकृत्य सिद्ध हो जाता है।
च्चिप्रत्ययान्त का उदाहरण शुक्लीकृत्य। सफेद करके अर्थात् अशुक्ल को शुक्ल करके। अशुक्लं शुक्लं कृत्वा ऐसे में शुक्ल अम्+कृत्वा लौकिक विग्रह है। कृष्वस्तियोगे सम्पद्यकर्तरि च्चिः से कृ धातु के योग में च्चि प्रत्यय, तद्धितान्त होने के कारण प्रातिपदिकसंज्ञा होकर उसके अवयव अम् विभक्ति का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् होकर शुक्ली+कृत्वा बना है। कृत्वा अव्यय है। अतः अव्यय से आये हुए प्रत्ययों का अव्ययादाप्सुपः से लुक् हो गया है। कृत्वा के योग में शुक्ली की ऊर्यादिच्चिडाचश्च से गतिसंज्ञा करने के बाद कुगतिप्रादयः से समास हो जाता है। तदनन्तर प्रातिपदिकसंज्ञा होती है। सुप् न होने के कारण सुप् के लुक् का प्रसंग नहीं है। शुक्लीकृत्वा बन गया है। अब कृदन्त में समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप् से क्त्वा के स्थान पर ल्यप् आदेश होकर, अनुबन्धलोप होने के बाद शुक्लीकृत्य बन जाता है। प्रथमानिर्दिष्ट शुक्ली का पूर्वप्रयोग होता है। समास होने के बाद पुनः सु विभक्ति, उसका भी अव्ययत्वेन लुक् करके शुक्लीकृत्य सिद्ध हो जाता है।
डाच्-प्रत्ययान्त का उदाहरण पटपटाकृत्य। पटत् इस प्रकार का शब्द करके। पटत् कृत्वा ऐसे में पटत् से अव्यक्तानुकरणाद् द्व्यजवरार्थादनितौ डाच् सूत्र से डाच् प्रत्यय की विवक्षा में डाचि बहुलं द्वे भवतः से द्वित्व, फिर टाप्, टिलोप, पररूप आदि करके पटपटा+कृत्वा बना है। कृत्वा के योग में पटपटा की ऊर्यादिच्चिडाचश्च से गतिसंज्ञा करने के बाद कुगतिप्रादयः से समास हो जाता है। तदनन्तर प्रातिपदिकसंज्ञा होती है। सुप् न होने के कारण सुप् के लुक् का प्रसंग नहीं है। पटपटाकृत्वा बन गया है। अब कृदन्त में समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप् से क्त्वा के स्थान पर ल्यप् आदेश होकर, कृ धातु को तुक् का आगम, अनुबन्धलोप होने के बाद पटपटाकृत्य बन जाता है। प्रथमानिर्दिष्ट गतिसंज्ञक पटपटा का पूर्वप्रयोग होता है। समास होने के बाद पुनः सु विभक्ति, उसका भी अव्ययत्वेन लुक् करके पटपटाकृत्य सिद्ध हो जाता है।
प्रादिसमास का उदाहरण है- सुपुरुषः। सुन्दर पुरुष। शोभनः पुरुषः लौकिक विग्रह और सु+पुरुष सु अलौकिक विग्रह है। ऐसी स्थिति में कुगतिप्रादयः से प्रादि सु के साथ समर्थ सुबन्त पुरुष+सु का समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति का लुक् करके सु+पुरुष बना। पूरा सूत्र ही प्रथमान्त है, अतः उसके द्वारा निर्दिष्ट सु की उपसर्जनसंज्ञा और उसका पूर्वप्रयोग। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सुविभक्ति करके सुपुरुषः सिद्ध हुआ। इसी तरह शोभनो राजा सुराजा, दुष्टो जनो दुर्जनः, निन्दितं दिनं दुर्दिनम्, सुष्ठु भाषितं सुभाषितम् आदि भी समझना चाहिए।
अब कुगतिप्रादयः इस सूत्र से किये गये प्रादिसमासों का ही अर्थविशेषों में समास करने के लिए विस्तार किया जा रहा है-
प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया। यह वार्तिक है। गत आदि अर्थों में वर्तमान प्र आदि निपातों का प्रथमान्त सुबन्त के साथ नित्य समास होता है और वह तत्पुरुष समास कहलाता है।
प्रादिसमास के क्षेत्र को फैलाने के लिए ही यह वार्तिक है।
प्राचार्यः। प्रगत आचार्यः। दूर गया हुआ आचार्य, श्रेष्ठ आचार्य, अपने विषय में
दक्ष आचार्य या आचार्य का भी आचार्य। प्रगतः आचार्यः यह लौकिक विग्रह और प्र आचार्य सु अलौकिक विग्रह है। प्र इस प्रादि निपात का आचार्य सु इस सुबन्त के साथ प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया से समास हुआ, प्र की उपसर्जनसंज्ञा, उसी का पूर्वनिपात, सुप् का लुक् करके प्र+आचार्य बना। दीर्घ हुआ- प्राचार्य। सु, रुत्वविसर्ग करके प्राचार्यः सिद्ध हुआ। इसी तरह प्रगतः पितामहः=प्रपितामहः, विरुद्धः पक्षः= विपक्षः, प्रकृष्टो वीरः=प्रवीरः आदि जगहों पर इस वार्तिक से समास किया जा सकता है।
अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया। यह वार्तिक है। क्रान्त अर्थात् पार गया हुआ, लाघ चुका, पारगामी आदि अर्थों में वर्तमान अति आदि निपातों का द्वितीयान्त समर्थ सुबन्त के साथ समास होता है और उसे तत्पुरुष समास कहा जाता है।