Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 40
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VṛttiGovind
LSK 949
गतिसमासविधायकं विधिसूत्रम्
कुगतिप्रादयः
Aṣṭādhyāyī 2.2.18
Vṛtti Varadarājācārya

एते समर्थेन नित्यं समस्यन्ते। कुत्सितः पुरुषः कुपुरुषः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१४९- कुगतिप्रादयः। प्र आदौ येषान्ते प्रादयः, कुश्च गतिश्च प्रादयश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वः कुगतिप्रादयः। कुगतिप्रादयः प्रथमान्तमेकपदं सूत्रम्। नित्यं क्रीडाजीविकयोः से नित्यम् की अनुवृत्ति आती है। समासः, तत्पुरुषः, सुप्, सह सुपा, विभाषा इत्यादि पदों की अनुवृत्ति और अधिकार है ही।

समर्थ सुबन्त शब्दों के साथ कु-शब्द, गतिसंज्ञक शब्द और प्र आदि का समास होता है।

इस सूत्र के द्वारा किये गये कार्य को गतिसमास या प्रादिसमास कहा जाता है। प्रायः अन्य सूत्रों के द्वारा किया गया समास वैकल्पिक होता है अर्थात् एक पक्ष में लौकिक विग्रह वाला वाक्य ही रह जाता है किन्तु इस सूत्र में नित्यम् की अनुवृत्ति लाकर नित्य से समास का विधान किया गया है।

कुपुरुषः। निन्दित पुरुष। कुत्सितः पुरुषः लौकिक विग्रह और कु+पुरुष सु अलौकिक विग्रह है। कुत्सित अर्थ में कु है। ऐसी स्थिति में कुगतिप्रादयः से समास हुआ, प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति का लुक् करके कु+पुरुष बना। पूरा सूत्र ही प्रथमान्त है, अतः उसके द्वारा निर्दिष्ट कु की उपसर्जनसंज्ञा और उसका पूर्वप्रयोग। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सुविभक्ति करके कुपुरुषः सिद्ध हुआ। इसी तरह कुत्सिता माता कुमाता, कुत्सिता दृष्टिः कुदृष्टिः आदि भी समझना चाहिए। ये कु-शब्द के साथ समास का उदाहरण हैं। गतिसंज्ञक के साथ समास का उदाहरण आगे अग्रिम सूत्र से गतिसंज्ञा करके देखिये।

क्रिया के योग में प्र आदियों की उपसर्गाः क्रियायोगे से उपसर्गसंज्ञा होती है तो गतिश्च से ऐसी ही स्थिति में गतिसंज्ञा भी होती है। इस संज्ञा के लिए अन्य सूत्र भी पढ़े गये हैं। एतदर्थ ही अगला सूत्र है।