शरदादिभ्यष्टच् स्यात् समासान्तोऽव्ययीभावे।
शरदः समीपमुपशरदम्। प्रतिविपाशम्।
गणसूत्रम्- जराया जरश्च। उपजरसमित्यादि।
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११७- अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः। शरत् प्रभृतिर्येषां ते शरत्प्रभृतयः। अव्ययीभावे सप्तम्यन्तं, शरत्प्रभृतिभ्यः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। राजाहःसखिभ्यष्टच् से टच् की अनुवृत्ति आती है
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और तद्धिताः, समासान्ताः, प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्यातिपदिकात् का अधिकार आ रहा है।
शरत् आदि शब्दों से समासान्त तद्धितसंज्ञक टच् प्रत्यय होता है अव्ययीभाव में।
टच् में टकार और चकार इत्संज्ञक हैं, अकार शेष रहता है। इससे हलन्त शब्द भी अजन्त बन जाता है। शरदादिगण है। इसके अन्तर्गत शरद्, विपाश्, अनस्, मनस्, उपानह्, दिव्, हिमवत्, अनडुह्, दिश्, दृश्, विश्, चेतस्, चतुर्, त्यद्, तद्, यद्, कियत् ये शब्द आते हैं।
उपशरदम्। शरद् (ऋतु) के समीप वाली ऋतु। शरदः समीपम् लौकिक विग्रह और शरद्+डस्+उप अलौकिक विग्रह में समीप इस अर्थ में विद्यमान उप का शरद् डस् के साथ अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्युद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद शरद्+डस्+उप इस समुदाय की कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई। डस् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। शरद्+उप बना। प्रथमानिर्दिष्ट सह की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक उप का पूर्वप्रयोग हुआ उप+शरद् बना। अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः से समासान्त टच् प्रत्यय, अनुबन्धलोप होकर उपशरद्+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर उपशरद् बना। अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञा, एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर उपशरद् को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ, किन्तु नाव्ययीभावादतोऽप्त्वपञ्चम्याः से विभक्ति अलुक् हुआ और सु के स्थान पर नपुंसकत्वात् अम् आदेश होकर पूर्वरूप करने पर उपशरदम् बना।
प्रतिविपाशम्। विपाश(नदी) के सम्मुख। विपाशं विपाशं (विपाशाया अभिमुखम्) प्रति लौकिक विग्रह और विपाश्+अम्+प्रति अलौकिक विग्रह में सम्मुख इस अर्थ में विद्यमान प्रति का अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्युद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद विपाश्+अम्+प्रति इस समुदाय की कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई। अम् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। विपाश्+प्रति बना। प्रथमानिर्दिष्ट प्रति की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक प्रति का पूर्वप्रयोग हुआ प्रति+विपाश् बना। अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः से समासान्त टच् प्रत्यय, अनुबन्धलोप होकर प्रतिविपाश्+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर प्रतिविपाश बना। अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञा, एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर प्रतिविपाश को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ, किन्तु नाव्ययीभावादतोऽप्त्वपञ्चम्याः से विभक्ति अलुक् हुआ और सु से स्थान पर नपुंसकत्वात् अम् आदेश होकर पूर्वरूप करने पर प्रतिविपाशम् बना।
जराया जरश्च। यह गणसूत्र शरत्प्रभृति में पठित है। अव्ययीभाव समास में जराशब्द से समासान्त टच् के साथ ही जरस् आदेश भी होता है।
उपजरसम्। बुढापे के निकट। जरायाः समीपम् लौकिक विग्रह और जरा ङस् उप अलौकिक विग्रह है। समीप अर्थ में उप का जरा ङस् के साथ अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि-व्युद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति-शब्दप्रादुर्भाव-पश्चाद्यथानुपूर्व-यौगपद्य-सादृश्य-सम्पत्ति-साकल्यान्तवचनेषु से समास हो गया। समास करने के बाद जरा+ङस्+उप इस समुदाय की कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा हो गई। ङस् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् हुआ। जरा+उप बना। प्रथमानिर्दिष्ट उप की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो गई तो उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जनसंज्ञक उप का पूर्वप्रयोग हुआ उप+जरा बना। अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः से समासान्त टच् प्रत्यय और जराया जरश्च इस गणसूत्र से जरा के स्थान पर जरस् आदेश होकर उपजरस्+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर उपजरस बना। अव्ययीभावश्च से अव्ययसंज्ञा, एकदेशविकृतमनन्यवत् इस न्याय के बल पर उपजरस को प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति आई और उसका अव्ययादाप्सुपः से लुक् प्राप्त हुआ, किन्तु नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः से विभक्ति का अलुक् हुआ और सु के स्थान पर अम् आदेश होकर पूर्वरूप करने पर उपजरसम् बना। ११८- अनश्च। अनः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। राजाहःसखिभ्यष्टच् से टच् तथा अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः से विभक्तिविपरिणाम करके अव्ययीभावात् की अनुवृत्ति आती है और तद्धिताः, समासान्ताः, प्रत्ययः, परश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात् का अधिकार चल रहा है। अनः यह अव्ययीभावात् का विशेषण है।