नदीभिः सह संख्या समस्यते।
वार्तिकम्- समाहारे चायमिष्यते।
पञ्चगङ्गम्। द्वियमुनम्।
९१५- नदीभिश्च। नदीभिस्तृतीयान्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। सङ्ख्या वंश्येन से सङ्ख्या की अनुवृत्ति आती है और सुप्, सह सुपा, प्राक्कडारात् समासः, अव्ययीभावः इन पदों का अधिकार आ ही रहा है।
सङ्ख्यावाचक सुबन्त शब्द का नदीवाचक सुबन्त शब्दों के साथ समास होता है, और वह अव्ययीभाव समास कहलाता है।
समाहारे चायमिष्यते। यह वार्तिक है। यह समास समाहार अर्थ में ही इष्ट है।
पञ्चगङ्गम्। पाँच गङ्गाओं का समूह। पञ्चानां गङ्गानां समाहारः यह लौकिक विग्रह है और पञ्चन् आम् गङ्गा आम् यह अलौकिक विग्रह है। ऐसी अवस्था में नदीभिश्च से समास हो जाता है। समासविधायक सूत्र नदीभिश्च में अनुवृत्त पद सङ्ख्या यह प्रथमान्त है और इसके द्वारा निर्दिष्ट शब्द पञ्चन् आम् की प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो जाती है और उसी का पूर्वनिपात भी होता है। पञ्चन्+आम्+गङ्गा+आम् की कृत्तिद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा करके सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से विभक्तियों का लुक् होकर पञ्चन्+गङ्गा बना। विभक्ति के लुक्
हो जाने पर भी प्रत्ययलक्षण द्वारा पञ्चन् में पदत्व मानकर के नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप होकर पञ्चगङ्गा बना। अव्ययीभावश्च से नपुंसक मानकर के ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य से गङ्गा के आकार को ह्रस्व करके पञ्चगङ्गा बना। सु उसका लुक् प्राप्त, उसे बाधकर के नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः से अम् आदेश, पूर्वरूप होकर पञ्चगङ्गम् सिद्ध हुआ।
द्वियमुनम्। दो यमुना नदियों का समूह। द्वयोर्यमुनयोः समाहारः यह लौकिक विग्रह है और द्वि ओस् यमुना ओस् यह अलौकिक विग्रह है। ऐसी अवस्था में नदीभिश्च से समास हो जाता है। समासविधायक सूत्र नदीभिश्च में अनुवृत्त पद सङ्ख्या यह प्रथमान्त है और इसके द्वारा निर्दिष्ट शब्द द्वि ओस् की प्रथमानिर्दिष्ट समास उपसर्जनम् से उपसर्जनसंज्ञा हो जाती है और उसी का पूर्वनिपात भी होता है। द्वि+ओस्+यमुना+ओस् की कृत्तद्धितसमासाश्च से प्रातिपदिकसंज्ञा करके सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से विभक्तियों का लुक् होकर द्वि+यमुना बना। अव्ययीभावश्च से नपुंसक मानकर के ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य से यमुना के आकार को ह्रस्व करके द्वियमुन बना। सु उसका लुक् प्राप्त, उसे बाधकर के नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः से अम् आदेश, पूर्वरूप होकर द्वियमुनम् सिद्ध हुआ।