Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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VṛttiGovind
LSK 864
निपातनार्थं विधिसूत्रम्
ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च
Aṣṭādhyāyī 3.3.97
Vṛtti Varadarājācārya

एते निपात्यन्ते।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८६४- ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च। ऊतिश्च यूतिश्च जूतिश्च सातिश्च हेतिश्च कीर्तिश्च तेषामितरेतरद्वन्द्व ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयः। ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयः प्रथमान्तं, चाव्ययं, द्विपदं सूत्रम्। मन्त्रे वृषेषपचमनविदभूवीरा उदात्तः से उदात्तः की तथा भावे, अकर्तरि कारके की अनुवृत्ति आती है। स्त्रियां वितन्, धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।

स्त्रीत्व से युक्त भाव एवं कर्ता से भिन्न कारक अर्थ में ऊति, यूति, जूति, साति, हेति और कीर्ति ये वितन्-प्रत्ययान्त शब्दों का निपातन होता है और ये शब्द उदात्त होते हैं।

जो कार्य प्रक्रिया के माध्यम से न दिखाकर सीधे सिद्ध शब्द को सूत्र में ही दिखाते हैं, उसे आचार्य ने निपातन नाम दिया है। उक्त शब्दों को कुछ भी प्रक्रिया न करके सूत्र में भी आचार्य ने सीधे साधुत्व कथन के लिए पढ़ा है। अब आगे देखते हैं कि किस तरह की प्रक्रिया हो सकती थी, यदि निपातन न किया जाता तो!

ऊतिः। रक्षा, क्रीडा, लीला आदि। अब रक्षणे धातु है। अब से स्त्रीत्वविशिष्ट भाव या कर्तृभिन्न कारक अर्थ में वितन् प्रत्यय करके ज्वरत्वरस्रिव्यविमवामुपधायाश्च से वकार को ऊठ् आदेश आदि करने पर ही ऊति बन सकता है किन्तु ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च से निपातन होने से उन सूत्रों के लगे विना ही ऊति शब्द सिद्ध मान लिया गया। निपातनात् यह शब्द अन्तोदात्त मान लिया गया अर्थात् प्रत्यय ति यह उदात्त स्वर वाला हुआ। निपातन का यहाँ पर वितन् से नित् होने से प्राप्त आद्युदात्त को बाधकर अन्तोदात्त करना यही फल है। ऊति की प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु आदि विभक्तियाँ आती हैं और मति-शब्द की तरह ऊतिः, ऊती, ऊतयः आदि रूप बनते हैं। ध्यान रहे कि वितन् प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग ही होते हैं।

यूतिः। मिलाना, मेलन। यु मिश्रणामिश्रणयोः धातु है। यु से स्त्रीत्वविशिष्ट भाव या कर्तृभिन्न कारक अर्थ में स्त्रियां वितन् से वितन् प्रत्यय करके युति बन सकता है किन्तु ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च से निपातन होने से उन सूत्रों के लगे विना ही युति शब्द बन गया और निपातनात् ही यु को दीर्घ भी हो गया। निपातनात् यह शब्द अन्तोदात्त मान लिया गया अर्थात् प्रत्यय ति यह उदात्त स्वर वाला हुआ। यूति की प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु आदि विभक्तियाँ आती हैं और मति-शब्द की तरह यूतिः, यूती, यूतयः आदि रूप बनते हैं।

जूतिः। तेज चलना, गति, वेग। पाणिनि जी ने जु ऐसा धातुपाठ में नहीं पढ़ा है, फिर भी सूत्र में उक्त धातु के उल्लेख होने के कारण जु गतौ ऐसी सौत्र धातु मान ली जाती

है। जु से स्त्रीत्वविशिष्ट भाव या कर्तृभिन्न कारक अर्थ में स्त्रियां क्तिन् से क्तिन् प्रत्यय करके जुति बन सकता है किन्तु ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च से निपातन होने से उन सूत्रों के लगे विना ही जुति शब्द बन गया और निपातनात् ही जु को दीर्घ भी हो गया। निपातनात् यह शब्द अन्तोदात्त भी मान लिया गया। जूति की प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु आदि विभक्तियाँ आती हैं और मति-शब्द की तरह जूतिः, जूती, जूतयः आदि रूप बनते हैं।

सातिः। नाश, भेंट, दान। षोऽन्तकर्मणि धातु है। धात्वादेः षः, सः से सकार आदेश और आदेच उपदेशोऽशिति से आत्व करके सा बना। इससे स्त्रीत्वविशिष्ट भाव या कर्तृभिन्न कारक अर्थ में स्त्रियां क्तिन् से क्तिन् प्रत्यय करके साति बन गया है। यहाँ पर द्यतिस्यतिमास्थामित्ति किति से इत्व की प्राप्ति हो सकती है किन्तु ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च से निपातन होने से उसका अभाव हुआ और साति शब्द ही बन गया। निपातनात् यह शब्द अन्तोदात्त भी मान लिया गया। साति की प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु आदि विभक्तियाँ आती हैं और मति-शब्द की तरह सातिः, साती, सातयः आदि रूप बनते हैं।

हेतिः। अस्त्र, अग्निज्वाला, सूर्यकिरण। हन हिंसागत्योः धातु है। हन् से स्त्रीत्वविशिष्ट भाव या कर्तृभिन्न कारक अर्थ में स्त्रियां क्तिन् से क्तिन् प्रत्यय करके अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो झलि क्ङिति से अनुनासिक न् का लोप हति बन सकता है किन्तु ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च के निपातन से एत्व होकर हेति बनाया गया है। यह शब्द अन्तोदात्त भी मान लिया गया। हेति की प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु आदि विभक्तियाँ आती हैं और मति-शब्द की तरह हेतिः, हेती, हेतयः आदि रूप बनते हैं।

कीर्तिः। यश। कृत संशब्दने चुरादि धातु है। कृत् से चौरादिक णिच् करके ण्याससन्थो युच् से युच् हो सकना था किन्तु ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च के निपातन से क्तिन् प्रत्यय ही हुआ और णेरनिटि से णि का लोप करके धातु के उपधाभूत ऋकार को इत्व, रपर, दीर्घ आदि होकर कीर्ति बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु आदि विभक्तियाँ आती हैं और मति-शब्द की तरह कीर्तिः, कीर्ती, कीर्तयः आदि रूप बनते हैं। ८६५- ज्वरत्वरस्रिव्यविमवामुपधायाश्च। ज्वरश्च त्वरश्च स्रिविश्च अविश्च मव् च तेषामितरेतरद्वन्द्वो ज्वरत्वरस्रिव्यविमवस्तेषाम्। ज्वरत्वरस्रिव्यविमवां षष्ठ्यन्तम्, उपधायाः षष्ठ्यन्तं, च अव्ययं, त्रिपदं सूत्रम्। च्छ्वोः शूडनुनासिके च से श् को छोड़कर सम्पूर्ण सूत्र और अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङिति से क्विझलोः एवं क्ङिति की अनुवृत्ति आती है।