Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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VṛttiGovind
LSK 863
क्तिन्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
स्त्रियां क्तिन्
Aṣṭādhyāyī 3.3.94
Vṛtti Varadarājācārya

स्त्रीलिङ्गे भावे क्तिन् स्यात्। घञोऽपवादः। कृतिः। स्तुतिः।

वार्तिकम्- ऋत्वादिभ्यः क्तिन्निष्ठावद्वाच्यः। तेन नत्वम्।

कीर्णिः। लूनिः। धूनिः। पूनिः।

वार्तिकम्- सम्पदादिभ्यः क्विप्। सम्पत्। विपत्। आपत्।

वार्तिकम्- क्तिन्नपीष्यते। सम्पत्तिः। विपत्तिः। आपत्तिः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८६३- स्त्रियां क्तिन्। स्त्रियां सप्तम्यन्तं, क्तिन् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। भावे, अकर्तरि च कारके की अनुवृत्ति एवं धातोः, प्रत्ययः और परश्च का अधिकार है।

स्त्रीत्वयुक्त भाव की विवक्षा में धातु से क्तिन् प्रत्यय होता है।

क्तिन् में ककार और नकार इत्संज्ञक हैं, ति शेष रहता है। यह क्तिन् भावे से प्राप्त घञ् प्रत्यय का अपवाद है। भाव अर्थ में स्त्रीत्व की विवक्षा होने पर घञ् न होकर क्तिन् ही होगा।

कृतिः। करणं कृतिः। करना। कृ-धातु से भाव अर्थ में स्त्रियां क्तिन् से क्तिन् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप होकर कृ+ति=कृति बना। स्त्रीत्व की विवक्षा में प्रत्यय हुआ है तो कृति शब्द स्त्रीलिङ्ग वाला बन गया। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु करके कृतिः बनता है। इसके रूप मति शब्द की तरह चलते हैं। केवल शस् में नत्व नहीं होता है, इसलिए कृतीः बनता है। डित्-विभक्ति डे, डसि, डस्, डि में वैकल्पिक नदीसंज्ञा होकर कुछ विशेष रूप बन जाते हैं। आइये, तालिका से समझें।

विभक्ति

एकवचन

द्विवचन

बहुवचन

प्रथमा

कृतिः

कृती

कृतयः

द्वितीया

कृतिम्

कृती

कृतीः

तृतीया

कृत्या

कृतिभ्याम्

कृतिभिः

चतुर्थी

कृत्यै, कृतये

कृतिभ्याम्

कृतिभ्यः

पञ्चमी

कृत्याः, कृतेः

कृतिभ्याम्

कृतिभ्यः

षष्ठी

कृत्याः, कृतेः

कृत्योः

कृतीनाम्

सप्तमी

कृत्याम्, कृतौ

कृत्योः

कृतिषु

सम्बोधन

हे कृते!

हे कृती!

हे कृतयः!

स्तुतिः। स्तवनं स्तुतिः। ष्टुञ् स्तुतौ। षत्व आदि करके स्तु धातु बना है। इससे कितन् करके कृतिः की तरह स्तुतिः बन जाता है। इसके रूप भी कृति की तरह ही चलते हैं।

ऋल्वादिभ्यः क्तिन्निष्ठावद्वाच्यः। यह वार्तिक है। ऋवर्णान्त धातु और लू आदि गणपठित धातु से परे किये गये कितन् प्रत्यय में निष्ठासंज्ञा की तरह व्यवहार किया जाता है। जैसे निष्ठाप्रत्यय में त को नकार आदेश होता है तो कितन् के तकार को भी नकार आदेश हो जाय। यही निष्ठावद्भाव है। इस वार्तिक के ल्वादि धातु हैं- लूञ्, स्तूञ्, कूञ्, वूञ्, धूञ्, शू, पू, वू, भू, मू, दू, जू, झू, धू, नू, कू, ऋ, गृ, ज्या, री, ब्ली और प्ली।

कीर्णिः। कृ विक्षेपे। कृ धातु से कितन् करके कृ+ति बना। ऋत इद्धातोः से रपरसहित इत्व अर्थात् इर् आदेश करके किर्+ति बना। हलि च से दीर्घ होकर कीर्+ति बना। ऋल्वादिभ्यः क्तिन्निष्ठावद्वाच्यः इस वार्तिक से निष्ठावद्भाव करके ति के तकार के स्थान पर ल्वादिभ्यः से नकार आदेश हुआ, कीर्+नि बना। रेफ से परे नकार को अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि से णत्व हुआ, कीर्+णि बना, वर्णसम्मेलन हुआ, रेफ का ऊर्ध्वगमन हुआ, कीर्णि बना। प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु आदि विभक्ति लाकर कृति शब्द की तरह कीर्णिः बनाइये और कृति की तरह रूप चलाइये।

लूनिः। लवनं लूनिः, काटना। लूञ् छेदने। लू धातु से कितन् करके लूति बना। निष्ठावद्भाव करके ल्वादिभ्यः से तकार के स्थान पर नत्व करके लूनि बनाकर प्रातिपदिकसंज्ञा करके कृति की तरह रूप बनाइये- लूनिः, लूनी, लूनयः।

धूनिः। धूञ् कम्पने, काँपना। धू धातु से कितन् करके धूति बना। निष्ठावद्भाव करके ल्वादिभ्यः से नत्व करके धूनि बनाकर प्रातिपदिकसंज्ञा करके कृति की तरह रूप बनाइये- धूनिः, धूनी, धूनयः।

सम्पदादिभ्यः क्विप्। क्तिन्नपीष्यते। यह वार्तिक है। सम्पत् आदि से क्विप् प्रत्यय होता है और कितन् भी होता है। इन दोनों वार्तिक से दो प्रत्ययों का विधान हुआ। क्विप् का सर्वापहार लोप हो जाता है किन्तु कितन् में ति शेष रहता है।

सम्पत्। सम्पत्तिः। सम् पूर्वक पद (गतौ) धातु से क्विप्, सर्वापहारलोप करके सम्पद् ही रहा। प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु विभक्ति, सकार का हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप हुआ। दकार को वावसाने से वैकल्पिक चर्त्व करके सम्पत्-सम्पद् बनते हैं। आगे सम्पदौ, सम्पदः, सम्पदम्, सम्पदौ, सम्पदः, सम्पदा, सम्पद्भ्याम् आदि रूप बनाये जाते हैं। कितन् होने के पक्ष में सम्पद्+ति बना। दकार के स्थान पर खरि च से चर्त्व करके तकार

आदेश होता है। वर्णसम्मेलन होकर सम्पत्ति बनता है। अब प्रातिपदिकसंज्ञा करके कृति की तरह रूप बनाइये। सम्पत्तिः, सम्पत्ती, सम्पत्तयः आदि।

अब इसी प्रकार विपूर्वक पद से विपत्-विपद्, विपत्तिः और आपूर्वक पद् धातु से आपत्-आपद् आपत्तिः भी बना सकते हैं।