स्वप्नः।
८६१- स्वपो नन्। स्वपः पञ्चम्यन्तं, नन् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। भावे और संज्ञायाम् को छोड़कर अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् की अनुवृत्ति आती है। धातोः, प्रत्ययः और परश्च का अधिकार है।
भाव और कर्तृभिन्न कारक में स्वप् धातु से नन्-प्रत्यय होता है।
नकार इत्संज्ञक है। नन्-प्रत्ययान्त भी पुँल्लङ्ग में ही होता है।
स्वप्नः। स्वपनं स्वप्नः। जिष्वप् शये। स्वप् धातु से स्वपो नन् से नन् प्रत्यय हुआ, नकार का लोप हुआ, स्वप्न बना। इसकी प्रातिपदिकसंज्ञा हुई, सु, रुत्वविसर्ग, स्वप्नः।