Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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VṛttiGovind
LSK 854
घञ्-प्रत्यय-ककारादेशविधायकं विधिसूत्रम्
निवासचितिशरीरोपसमाधानेष्वादेश्च कः
Aṣṭādhyāyī 3.3.41
Vṛtti Varadarājācārya

एषु चिनोतेर्घञ्, आदेश्च ककारः। उपसमाधानं राशीकरणम्।

निकायः। कायः। गोमयनिकायः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८५४- निवासचितिशरीरोपसमाधानेष्वादेश्च कः। निवासश्च चितिश्च शरीरञ्च उपसमाधानञ्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वो निवासचितिशरीरोपसमाधानानि, तेषु। निवासचितिशरीरोपसमाधानेषु सप्तम्यन्तं, आदेः षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं, कः प्रथमान्तम्, अनेकपदं सूत्रम्। हस्तादाने चेरस्तेये से चेः, पदरुजविशस्पृशो घञ् से घञ् तथा अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् इस पूरे सूत्र की अनुवृत्ति आती है। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।

निवास, चिति( चयन ), शरीर और उपसमाधान( राशीकरण ) अर्थ में धातु से परे घञ् प्रत्यय होता है और धातु के आदिवर्ण के स्थान पर ककार आदेश भी होता है।

जहाँ रहते हैं, उसे निवास, जिसका चयन किया जाता है उसे चिति, अस्थियों के समूह को शरीर और इकठ्ठे करने को उपसमाधान कहते हैं। निकायः। कायः। गोमयनिकायः। ये क्रमशः निवास, शरीर और उपसमाधान के उदाहरण हैं। चिति का उदाहरण लघुसिद्धान्तकौमुदी में नहीं दिया गया है। वैसे आकायः इस का उदाहरण हो सकता है। नि+चि से निकायः, चि से कायः, आ+चि से आकायः और गोमय+नि+चि से गोमयनिकायः बन जाते हैं। सभी में चिञ् चयने वाला चि धातु है। निवासचितिशरीरोपसमाधानेष्वादेश्च कः से घञ् प्रत्यय और धातु के आदि में विद्यमान चकार के स्थान पर

ककार आदेश करके काय बनता है। फलतः निकायः(घर) आकायः (चयन की अग्नि या स्थान) कायः(चीयतेऽस्मिन् अस्थ्यादिकम् अथवा चीयते अन्नादिभक्षितेन स कायः, शरीर) और गोमयनिकायः (गोबर की राशि) ये शब्द सिद्ध हो जाते हैं।