रञ्जेर्नलोपः स्यात्। रागः। अनयोः किम्? रज्यत्यस्मिन्निति रङ्गः।
८५३- घञि च भावकरणयोः। भावश्च करणञ्च तयोरितरेतरद्वन्द्वो भावकरणे, तयोः। घञि
सप्तम्यन्तं, च अव्ययं, भावकरणयोः सप्तम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। रञ्जेश्च से रञ्जेः और श्नान्नलोपः से नलोपः की अनुवृत्ति आती है।
भाव या करण अर्थ में विहित घञ् प्रत्यय के परे होने पर रन्ज् धातु के नकार का लोप होता है।
रञ्ज् धातु में जकार का मूल नकार ही है। जकार के योग में उसका अनुस्वार और परसवर्ण होकर जकार बना है। उसी नकार का लोप यह सूत्र करता है।
रागः। रज्यतेऽनेन। जिससे रँगा जाए अर्थात् रंगने का सामान, रंग आदि। रञ्ज् रागे। यहाँ पर कर्ता से भिन्न करण कारक की विवक्षा में रञ्ज् धातु से अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् से घञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके रञ्ज्+अ बना। घञि च भावकरणयोः से जकार के स्थानी नकार का लोप करके रज्+अ बना। अत उपधायाः से उपधा की वृद्धि और चजोः कुः घिण्णयतोः से जकार को कुत्व करके वर्णसम्मेलन करने पर राग बना। घञन्त शब्द पुँल्लिङ्ग होता है। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु, रुत्व, विसर्ग- रागः।
अनयोः किम्? रज्यत्यस्मिन्निति रङ्गः। यदि घञि च भावकरणयोः इस सूत्र में भावकरणयोः ऐसा नहीं कहते तो रज्यति अस्मिन् ऐसे विग्रह में अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् से अधिकरण अर्थ में घञ् प्रत्यय होने पर नकार का लोप होकर अनिष्ट रूप बन जाता। भावकरणयोः पद देने से अधिकरण में नकार का लोप नहीं हुआ। अतः रङ्गः बन गया।