Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 36
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VṛttiGovind
LSK 851
घञ्प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
भावे
Aṣṭādhyāyī 3.3.18
Vṛtti Varadarājācārya

सिद्धावस्थापन्ने धात्वर्थे वाच्ये धातोर्घञ्। पाकः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

८५१- भावे। भावे सप्तम्यन्तम्, एकपदं सूत्रम्। पदरुजविशस्पृशो घञ् से घञ् की अनुवृत्ति आती है और धातोः, प्रत्ययः और परश्च का अधिकार है।

सिद्धावस्था रूप में प्राप्त धातु का अर्थ वाच्य होने पर धातु से घञ् प्रत्यय होता है।

धात्वर्थ अर्थात् क्रिया दो प्रकार की होती है- पहली सिद्धावस्थापन्न और दूसरी साध्यावस्थापन्न। यत्र क्रियायाः क्रियान्तराकाङ्क्षा सा सिद्धावस्थापन्ना और यत्र क्रियायाः क्रियान्तरानाकाङ्क्षा सा साध्यावस्थापन्ना अर्थात् जिस क्रिया में अन्य क्रिया की आकांक्षा होती है, वह सिद्ध अवस्था को प्राप्त क्रिया है। जैसे- पाकः, त्यागः आदि और जिस क्रिया में अन्य क्रिया की आकांक्षा नहीं होती है, वह साध्य अवस्था को प्राप्त क्रिया है। जैसे- पचति, त्यजति आदि। जब क्रिया सिद्ध अवस्थापन्न होती है, तब वह द्रव्य की तरह हो जाती है। अतः ऐसी क्रिया से घञ् आदि प्रत्यय होते हैं। घञ् में घकार की लशक्वतद्धिते से और जकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होकर केवल अकार ही शेष रहता है। घित् का फल चजोः कु घिण्यतोः से कुत्व और जित् का फल अत उपधायाः आदि से वृद्धि आदि है।

पाकः। पचनं पाकः। डुपचष् पाके। पच् से भावे से घञ्, अनुबन्धलोप, पच्+अ बना। णित्व होने के कारण उपधाभूत पकारोत्तरवर्ती अकार को वृद्धि, पाच्+अ में चकार को चजोः कु घिण्ण्यतोः से कुत्व होकर ककार हुआ, पाक बना। प्रातिपदिक संज्ञा के बाद स्वादिकार्य होकर पाकः सिद्ध हुआ। आगे पाकौ, पाकाः आदि तो बनाये ही जा सकते हैं।

उक्त प्रक्रिया से ही भज् से भागः, रम् से रामः, नश् से नाशः, पठ् से पाठः आदि सिद्ध किये जा सकते हैं।