आदन्ताद्धातोरनुपसर्गात् कर्मण्युपपदे कः स्यात्। अणोऽपवादः।
आतो लोप इटि च। गोदः। धनदः। कम्बलदः। अनुपसर्गे किम्? गोसन्दायः।
वार्तिकम्- मूलविभुजादिभ्यः कः। मूलानि विभुजति मूलविभुजो रथः।
आकृतिगणोऽयम्। महीध्रः। कुध्रः।
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७९१- आतोऽनुपसर्गे कः। आतः पञ्चम्यन्तम्, अनुपसर्गे सप्तम्यन्तं, कः प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में कर्मण्यण् से कर्मणि की अनुवृत्ति आती है। धातोः, प्रत्ययः, परश्च का अधिकार है।
कर्म के उपपद रहते उपसर्गरहित आकारान्त धातु से क प्रत्यय होता है।
यह सूत्र कर्मण्यण् का अपवाद है। क में ककार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा होती है, अकार शेष रहता है। कित् करने का फल आतो लोप इटि च से आकार का लोप करना है। यदि कित् न होता तो आकार का लोप प्राप्त न होता और आतो युक् चिण्कृतोः से युक् का आगम होकर अनिष्ट रूप सिद्ध हो जाता।
गोदः। कम्बलदः। धनदः। दा दाने। गां ददाति, धनं ददाति, कम्बलं ददाति। अर्थ भी क्रमशः गौ देने वाला, कम्बल देने वाला, धन देने वाला। इन तीनों प्रयोगों में दा धातु है और क्रमशः गो, कम्बल और धन उपपद हैं। कोई उपसर्ग नहीं है। अतः दा से कर्मण्यण् से प्राप्त अण् को बाधकर आतोऽनुपसर्गे कः से क प्रत्यय, अनुबन्धलोप, आकार का आतो लोप इटि च से लोप हुआ। गो+द्+अ, कम्बल+द्+अ, धन+द्+अ बना। वर्णसम्मेलन हुआ- गोद, कम्बलद और धनद बने। प्रातिपदिकसंज्ञा करके सु, रुत्वविसर्ग करके गोदः, कम्बलदः और धनदः ये रूप सिद्ध हुए।
इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण-
१-
२- नृन् पातीति, नृ+पा+क=नृपः, मनुष्यों की रक्षा करने वाला, राजा।
३-
भुवं पातीति, भू+पा+क=भूपः, पृथ्वी की रक्षा करने वाला, राजा।
३- जलं ददातीति, जल+दा+क=जलदः, जल देने वाला, बादल।
४- कृतं जानातीति, कृत+ज्ञा+क=कृतज्ञः, किये गये उपकार को मानने वाला।
५- मधु पिबतीति, मधु+पा+क=मधुपः, मधु पीने वाला, भ्रमर।
इसी तरह अनेक आकारान्त धातुओं से कर्म उपपद होने पर क प्रत्यय करके अनेक रूप बना सकते हैं।
मूलविभुजादिभ्यः कः। यह वार्तिक है। मूलविभूज आदि शब्दों की सिद्धि के लिए क प्रत्यय हो, ऐसा कहना चाहिए।
मूलविभुजो रथः। वृक्षों की जड़ों को टेंढ़ा कर देने वाला रथ। यहाँ मूल शस्+वि+भुज् ऐसा अलौकिक विग्रह है। भुजो कौटिल्ये धातु है। कर्ता अर्थ में उक्त मूलविभुजादिभ्यः कः इस वार्तिक से क प्रत्यय, अनुबन्धलोप, कित् होने से लघूपधगुण का अभाव, कृत् के योग में षष्ठी, मूल+आम्+विभुज में उपपदसमास होकर स्वादिकार्य करके मूलविभुजः बना।
आकृतिगणोऽयम्। मूलविभुजादि आकृतिगण है। इसके शब्दों की परिगणना नहीं है। जहाँ क प्रत्यय, गुणाभाव जैसे रूप दीखें तो यह समझना चाहिए के ऐसे शब्द इस गण के अन्तर्गत आते हैं।
महीधः। मही (पृथ्वी) को धारण करने वाला, पर्वत। महीं धरतीति। मही+अम्+धृ (धृञ् धारणे)। मूलविभुजादिभ्यः कः से क प्रत्यय, कित्वात् गुणाभाव, इको यणचि से यण् होने पर ऋकार के स्थान पर र् आदेश होने पर मही+ध्+र्+अ=मही+ध्र बना। कृद्योग षष्ठी आने पर मही+अस्+ध्र, उपपदसमास करके स्वादिकार्य करने पर महीधः सिद्ध होता है।
कुधः। कु (पृथ्वी) को धारण करने वाला, पर्वत। कुं धरतीति। कु+अम्+धृ (धृञ् धारणे)। मूलविभुजादिभ्यः कः से क प्रत्यय, कित्वात् गुणाभाव, इको यणचि से यण् होने पर ऋकार के स्थान पर र् आदेश होने पर कु+ध्+र्+अ=कु+ध्र बना। कृद्योग षष्ठी आने पर कु+अस्+ध्र, उपपदसमास करके स्वादिकार्य करने पर कुधः सिद्ध होता है।