Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 34
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VṛttiGovind
LSK 790
अण्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
कर्मण्यण्
Aṣṭādhyāyī 3.2.1
Vṛtti Varadarājācārya

कर्मण्युपपदे धातोरण् प्रत्ययः स्यात्। कुम्भं करोतीति कुम्भकारः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७८९. - कर्मण्यण्। कर्मणि सप्तम्यन्तम्, अण् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। धातो:, प्रत्यय:, परश्च इन तीनों पदों का अधिकार है।

कर्म उपपद होने पर धातुओं से अण् प्रत्यय होता है।

अण् में णकार की इत्संज्ञा होती है। णित् होने के कारण वृद्धि तो होगी ही, अन्य कार्य भी हो सकते हैं।

कुम्भकारः। कुम्भं करोति। डुकृञ् करणे। कुम्भ अर्थात् घड़ा बनाता है या घड़ा बनाने वाला। कुम्भ+अम्+कृ यहाँ पर कुम्भ यह कर्म है और कृ धातु है। कुम्भ+अम्+कृ इस अवस्था में कुम्भ की तत्रोपपदं सप्तमीस्थम् से उपपदसंज्ञा हुई और कर्म उपपद रहने पर कृ-धातु से कर्मण्यण् से अण् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप हुआ। कुम्भ+कृ+अ बना।

अकार णित् है, उसके परे रहते अचो ञ्णिति से कृ को आर्-वृद्धि हुई। क्+आर=कार, कुम्भ+कार बना। कार इस कृदन्त के योग में कुम्भ से कर्तृकर्मणोः कृति से षष्ठी विभक्ति डस् आई। कुम्भ डस्+कार में उपपदमतिड् से उपपद समास होकर समास के अवयव सुप् डस् का सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से लुक् होकर कुम्भकार हुआ। इससे सु विभक्ति और रुत्वविसर्ग करके कुम्भकारः बन गया। यह तो वास्तविक प्रक्रिया है किन्तु इस प्रक्रिया में कुछ कठिन लगे तो बस, इतना समझना कि कुम्भ करोति इस विग्रह में कुम्भ कर्म है, उसकी उपपदसंज्ञा हुई और कर्मण्यण् से अण् हुआ। अण् के परे होने पर कृ की वृद्धि हुई, कुम्भकार बना। सु, रुत्वविसर्ग होकर कुम्भकारः सिद्ध हुआ। आपको कठिनाई इसलिए आ सकती है कि आपने अभी समास पढ़ा नहीं है। उपपदमतिड् यह सूत्र समासप्रकरण क है।

जिस तरह से आपने कुम्भकारः बनाया, उसी तरह से निम्नलिखित शब्दों की प्रक्रिया भी कर सकते हैं- भाष्यं करोतीति भाष्यकारः। सूत्रं करोतीति सूत्रकारः। सूत्रं धारयतीति सूत्रधारः।