Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 30
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VṛttiGovind
LSK 754
चिणादेशविधायकं विधिसूत्रम्
चिण् भावकर्मणोः
Aṣṭādhyāyī 3.1.66
Vṛtti Varadarājācārya

च्लेश्चिण् स्याद् भावकर्मवाचिनि तशब्दे परे।

अभावि। अभाविष्यत, अभविष्यत। अकर्मकोऽप्युपसर्गवशात् सकर्मकः।

अनुभूयते आनन्दश्चैत्रेण त्वया मया च। अनुभूयते। अनुभूयन्ते। त्वमनुभूयसे।

अहमनुभूये। अन्वभावि। अन्वभाविषाताम्, अन्वभाविषाताम्। णिलोपः।

भाव्यते। भावयाञ्चक्रे। भावयाम्बभूवे। भावयामासे। चिण्वदिट्।

आभीयत्वेनासिद्धत्वाणिलोपः। भाविता, भावयिता। भाविष्यते, भावयिष्यते।

अभाव्यत। भाव्येत। भाविषीष्ट, भावयिषीष्ट। अभावि। अभाविषाताम्।

अभावयिषाताम्। बुभूष्यते। बुभूषाञ्चक्रे। बुभूषिता। बुभूषिष्यते। बोभूयते।

बोभूयते। अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः। स्तूयते विष्णुः। स्ताविता, स्तोता।

स्ताविष्यते, स्तोष्यते। अस्तावी। अस्ताविषाताम्, अस्तोषाताम्।

ऋ गतौ। गुणोऽर्तीति गुणः। अर्यते। स्मृ स्मरणे। स्मर्यते। सस्मरे।

उपदेशग्रहणाच्चिण्वदिट्। आरिता, अर्ता। स्मारिता, स्मर्ता।

अनिदितामिति नलोपः। स्रस्यते। इदितस्तु नन्द्यते। सम्प्रसारणम्- इज्यते।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

७५४-चिण् भावकर्मणोः। भावश्च कर्म च भावकर्मणी, तयोर्भावकर्मणोः। चिण् ते पदः से ते की अनुवृत्ति आती है।

भाव और कर्मवाची त-शब्द के परे होने पर च्लि के स्थान पर चिण् आदेश होता है।

.....

चिण् में चकार और णकार की इत्संज्ञा होती है, इ शेष रहता है। णित् वृद्धि के लिए है।

अभावि। लुङ् में अभू+त बना है। च्लि लुङि से च्लि प्रत्यय, उसके स्थान पर चिण् भावकर्मणोः से चिण् आदेश, अनुबन्धलोप होकर अभू+इत बना। णित् होने के कारण अचो व्णिति से भू की वृद्धि होकर आव् आदेश हुआ, अभाव्+इत बना। वर्णसम्मेलन होकर अभावि+त बना। चिणो लुक् से त का लुक् हुआ- अभावि। त्वया मया अन्यैश्च अभावि= तुम्हारे मेरे या अन्य किसी से हुआ।

अभाविष्यत। लृङ् में- स्यसिच्सीयुट्तासिषु भावकर्मणोरुपदेशेऽञ्ज्ञनग्रहदृशां वा चिण्वदिट् च से चिण्वत् और इट् आगम होकर अभाविष्यत, न होने के पक्ष में अभविष्यत। सुवृष्ट्या चेदभाविष्यत (अभविष्यत) सुभिक्षेणाभाविष्यत(अभविष्यत) सुवृष्टि होगी तो सुभिक्ष होगा।

अकर्मकोऽप्युपसर्गवशात् सकर्मकः। अकर्मक धातु भी उपसर्ग के योग से कभी कभी सकर्मक हो जाता है। जैसे कि भू धातु अकर्मक है, इसके साथ अनु इस उपसर्ग के योग से अनुभव करना है अर्थ बन जाता है। देवदत्तः आनन्दम् अनुभवति=देवदत्त आनन्द का अनुभव करता है। इसके कर्मवाच्य में देवदत्तेन आनन्दः अनुभूयते बन जाता है। भाववाच्य में तो केवल प्रथमपुरुष और एकवचन ही होता है किन्तु धातु के सकर्मक बन जाने की स्थिति में जब कर्मवाच्य का प्रयोग हो तो सभी पुरुष और सभी वचन के रूप बनते हैं। जैसे- अनुभूयते आनन्दश्चैत्रेण त्वया मया च। अनुभूयेते। अनुभूयन्ते। (रामेण) त्वमनुभूयसे। (भवता) अहमनुभूये। अन्वभावि। अन्वभाविषाताम्, अन्वभविषाताम्। इसी तरह-

तेन सुखमनुभूयते= उसके द्वारा सुख अनुभव किया जाता है।

साधकैः सुखमोक्षौ अनुभूयेते= साधकों के द्वारा सुख और मोक्ष अनुभव किये जाते हैं। तेन शीतवर्षातपाः अनुभूयन्ते= उसके द्वारा शीत, वर्षा और धूप अनुभव किये जाते हैं। ताभ्यां त्रिविधदुःखानि अनुभूयन्ते= उन दोनों के द्वारा तीन प्रकार के दुःख अनुभव किये जाते हैं।

तैः सच्चिदानन्दा अनुभूयन्ते= उन सबों के द्वारा सत्, चित् और आनन्द अनुभव किये जाते हैं।

त्वया धर्मार्थकाममोक्षा अनुभूयन्ते=तुम्हारे द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष अनुभव किये जाते हैं।

युवाभ्यां सुखमनुभूयते=तुम दोनों के द्वारा सुख अनुभव किया जाता है।

युष्माभिः सुखदुःखे अनुभूयेते= तुम दोनों के द्वारा सुख और दुःख अनुभव किये जाते हैं।

मया लक्ष्मीनारायणौ अनुभूयेते= मेरे द्वारा लक्ष्मी और नारायण अनुभव किये जाते हैं।

आवाभ्यां शीतवर्षातपाः अनुभूयन्ते= हम दोनों के द्वारा शीत, वर्षा और धूप अनुभव किये जाते हैं।

अस्माभिर्ब्रह्मानुभूयते= हम लोगों के द्वारा ब्रह्म अनुभव किया जाता है।

रामेण सुखमनुभूयते= राम के द्वारा सुख अनुभव किया जाता है।

रामेण सुखदुःखे अनुभूयेते= राम के द्वारा सुख और दुःख अनुभव किये जाते हैं।

रामेण शीतवर्षातपाः अनुभूयन्ते= राम से शीत, वर्षा और धूप अनुभव किये जाते हैं।

..... रामेण त्वमनुभूयसे= राम के द्वारा तुम अनुभव किये जाते हो।

रामेण युवामनुभूयेथे= राम के द्वारा तुम दोनों अनुभव किये जाते हो।

रामेण यूयमनुभूयध्वे= राम के द्वारा तुम सब अनुभव किये जाते हो।

रमयाहमनुभूये= रमा के द्वारा मैं अनुभव किया जाता हूँ।

रमयावाममनुभूयावहे= रमा के द्वारा हम दोनों अनुभव किये जाते हैं।

रमया वयमनुभूयामहे= रमा के द्वारा हम सब अनुभव किये जाते हैं।

भाववाच्य और कर्मवाच्य के रूपों में कोई भेद नहीं है किन्तु भाववाच्य में केवल प्रथमपुरुष और एकवचन होता है तथा कर्मवाच्य में सभी पुरुष और सभी वचन होते हैं।

अब भू के कर्मवाच्य के रूपों का आनन्द लेते हैं-

लट्- अनुभूयते, अनुभूयेते, अनुभूयन्ते, अनुभूयसे, अनुभूयेथे, अनुभूयध्वे, अनुभूये, अनुभूयावहे, अनुभूयामहे।

लिट्- अनुबभूवे, अनुबभूवाते, अनुबभूविरे, अनुबभूविषे, अनुबभूवाथे, अनुबभूविद्वे- अनुबभूविध्वे, अनुबभूवे, अनुबभूविवहे, अनुबभूविमहे।

लुट्- अनुभाविता, अनुभावितारौ, अनुभावितारः, अनुभावितासे, अनुभावितासाथे, अनुभाविताध्वे, अनुभाविताहे, अनुभावितास्वहे, अनुभावितास्महे।

अनुभविता, अनुभवितारौ, अनुभवितारः, अनुभवितासे, अनुभवितासाथे, अनुभविताध्वे, अनुभविताहे, अनुभवितास्वहे, अनुभवितास्महे।

लृट्- अनुभाविष्यते, अनुभाविष्येते, अनुभाविष्यन्ते, अनुभाविष्यसे, अनुभाविष्येथे, अनुभाविष्यध्वे, अनुभाविष्ये, अनुभाविष्यावहे, अनुभाविष्यामहे।

अनुभविष्यते, अनुभविष्येते, अनुभविष्यन्ते, अनुभविष्यसे, अनुभविष्येथे, अनुभविष्यध्वे, अनुभविष्ये, अनुभविष्यावहे, अनुभविष्यामहे।

लोट्- अनुभूयताम्, अनुभूयेताम्, अनुभूयन्ताम्, अनुभूयस्व, अनुभूयेथाम्, अनुभूयध्वम्, अनुभूयै, अनुभूयावहै, अनुभूयामहै।

लङ्- अन्वभूयत, अन्वभूयेताम्, अन्वभूयन्त, अन्वभूयथाः, अन्वभूयेथाम्, अन्वभूयध्वम्, अन्वभूये, अन्वभूयावहि, अन्वभूयामहि।

विधिलिङ्- अनुभूयेत, अनुभूयेयाताम्, अनुभूयेरन्, अनुभूयेथाः, अनुभूयेयाथाम्, अनुभूयेध्वम्, अनुभूयेय, अनुभूयेवहि, अनुभूयेमहि।

आशीर्लिङ्- अनुभाविषीष्ट, अनुभाविषीयास्ताम्, अनुभाविषीरन्,

अनुभाविषीष्टाः, अनुभाविषीयास्थाम्, अनुभाविषीद्वम्-अनुभाविषीध्वम्, अनुभाविषीय, अनुभाविषीष्वहि, अनुभाविषीष्महि।

अनुभविषीष्ट, अनुभविषीयास्ताम्, अनुभविषीरन्, अनुभविषीष्टाः, अनुभविषीयास्थाम्, अनुभविषीद्वम्-अनुभविषीध्वम्, अनुभविषीय, अनुभविषीष्वहि, अनुभविषीष्महि।

लुङ्- अन्वभावि, अन्वभाविषाताम्, अन्वभाविषत, अन्वभाविष्टाः, अन्वभाविषाथाम्, अन्वभाविद्वम्, अन्वभाविध्वम्, अन्वभाविषि, अन्वभाविष्वहि, अन्वभाविष्महि।

अन्वभावि, अन्वभविषाताम्, अन्वभविषत, अन्वभविष्टाः, अन्वभविषाथाम्, अन्वभविद्वम्, अन्वभविध्वम्, अन्वभविषि, अन्वभविष्वहि, अन्वभविष्महि।

लृङ्- अन्वभाविष्यत, अन्वभाविष्येताम्, अन्वभाविष्यन्त, अन्वभाविष्यथाः, अन्वभाविष्येथाम्,

..... अन्वभाविष्यध्वम्, अन्वभाविष्ये, अन्वभाविष्यावहि, अन्वभाविष्यामहि।

अन्वभविष्यत, अन्वभविष्येताम्, अन्वभविष्यन्त, अन्वभविष्यथाः, अन्वभविष्येथाम्, अन्वभविष्यध्वम्, अन्वभविष्ये, अन्वभविष्यावहि, अन्वभविष्यामहि।

यहाँ तक तो सामान्य भू धातु से भावकर्म में होने वाले रूपों का वर्णन किया गया। हेतुमति च से णिच् होने पर ण्यन्त भू धातु से, सन्नन्त भू धातु से, यङन्त भू धातु से और यङ्लुगन्त भूधातु से भी भावकर्म में प्रयोग बनते हैं। इसी तरह सभी धातुओं से भावकर्म में रूप बनाये जाते हैं। इस तरह एक धातु से अनन्त रूप बनते हैं तो सभी धातुओं से कितने रूप बन जाते होंगे, यह अनुमान लगाना बहुत ही कठिन है।

कोई भी अकर्मक धातु प्रेरणार्थक णिच् प्रत्यय करने के बाद सकर्मक हो जाता है। जैसे देवदत्तो भवति में भू धातु अकर्मक है किन्तु जब प्रेरणार्थक णिच् करके भावयति बनाया जाता है तो यह ण्यन्त भावि धातु सकर्मक हो जाता है। इसलिए यज्ञदत्तो देवदत्त भावयति=यज्ञदत्त देवदत्त को होवाता है, इस वाक्य में भावि धातु का कर्म देवदत्त हो गया। अतः ऐसी सभी ण्यन्त धातुओं के कर्मवाच्य में ही रूप बनते हैं। यहाँ पर भी ण्यन्त भावि धातु से कर्म में लकार करके सभी पुरुष के सभी वचनों के रूप बनाये जा सकते हैं।

णिलोपः, भाव्यते। भू धातु से हेतुमति च से णिच् होने के बाद भावि बना है। इसकी धातुसंज्ञा हुई है। उससे सकर्मक होने से कर्मवाच्य में लट् लकार, भावकर्मणोः से त प्रत्यय करके सार्वधातुके यक् से यक् करने पर भावि+य+त बना। अनिडादि आर्धधातुक के परे होने पर णेरनिटि से णि का लोप करके त को एत्व करने पर भाव्यते रूप बनता है। भाव्यते, भाव्येते, भाव्यन्ते आदि।

भावयाञ्चक्रे। भावयाम्बभूवे। भावयामासे। लिट् में भावि से आम्, गुण अयादेश करके भावयाम् बनता है, लिट् का लुक् करके कृ का अनुप्रयोग करने पर क्रमशः भावयाञ्चक्रे, भावयाञ्चक्राते, भावयाञ्चक्रिरे आदि रूप तथा भू का अनुप्रयोग करने पर भावयाम्बभूवे, भावयाम्बभूवाते, भावयाम्बभूविरे आदि एवं अस् का अनुप्रयोग करने पर भावयामासे, भावयामासाते, भावयामासिरे आदि रूप बन जाते हैं।

आभीयत्वेनासिद्धत्वाणिणलोपः। स्मरण रहे कि असिद्धवदत्राभात् ६।४।२२॥ अर्थात् षष्ठाध्याय के चतुर्थ पाद के बाईसवें सूत्र से इस पाद की समाप्ति तक के सूत्रों को आभीय कहा जाता है और यदि एक ही जगह दो आभीय सूत्र लग रहे हों तो दूसरे आभीय की कर्तव्यता में पहला आभीय सूत्र असिद्ध हो जाता है। जैसा कि भाविता में हो रहा है। स्यसिच्सीयुट्तासिषु भावकर्मणोरुपदेशेऽज्झनग्रहदृशां वा चिण्वदिट् च ६।४।६२॥ और णेरनिटि ६।४।५१॥ ये दोनों सूत्र उक्त रीति से आभीय हैं। लुट् में भावि+ता बन जाने के बाद स्यसिच्सीयुट्तासिषु० से चिण्वदिट् करके भावि+इता बना है। अब हमें दूसरा आभीय कार्य णेरनिटि से णि के इकार का लोप करना है। दोनों कार्य समानाश्रय (समान निमित्त वाले) हैं। अतः असिद्धवदत्राभात् के नियम से दूसरे आभीय की कर्तव्यता में पहला आभीय असिद्ध होता है अर्थात् पहले आभीय कार्य स्यसिच्सीयुट्तासिषु० के द्वारा चिण्वदिट् दूसरे आभीय शास्त्र णेरनिटि की दृष्टि में असिद्ध होगा तो णेरनिटि से णि के इकार का लोप हो जायेगा। णेरनिटि से णि के लोप करने में अनिट् आदि आर्धधातुक निमित्त है। जब तक चिण्वत् इट् असिद्ध नहीं होगा, तब तक यह णि का लोप नहीं कर सकता। इस तरह एक आभीय की कर्तव्यता में दूसरा आभीय असिद्ध होता है जिससे

.....

णेरनिटि से णि का लोप होकर भाव्+इता=भाविता सिद्ध हुआ। चिण्वदिट् वैकल्पिक है। इसके न लगने के पक्ष में भावि+ता है। आर्धधातुकस्येद् वलादेः से नित्य से इट् आगम हुआ- भावि+इता बना। यह इट् णेरनिटि की दृष्टि में असिद्ध नहीं होता, क्योंकि यह आभीय नहीं है। अतः णि का लोप भी नहीं हुआ। णि के इकार को गुण, अय् आदेश होकर भावयिता सिद्ध हुआ। इस तरह से दो रूप बन गये- भाविता और भावयिता। आगे तस् आदि में भी यही प्रक्रिया की जाती है, जिससे नौ दूने अठारह रूप लुट् में बन जाते हैं।

लृट् में भी इसी तरह की प्रक्रिया होती है जिससे दो-दो रूप बनते हैं।

भाविष्यते, भावयिष्यते। लृट् में भावि से चिण्वदिट् होकर उसके आभीय होने के कारण असिद्ध होने से णि का लोप होने पर भाविष्यते, भाविष्यते, भाविष्यते आदि रूप बनते हैं और चिण्वदिट् न होने के पक्ष में भावि+इष्यते हैं, गुण, अयादेश, वर्णसम्मेलन करके भावयिष्यते, भावयिष्यते, भावयिष्यते आदि रूप बनाये जाते हैं।

लोट् में भाव्यताम्, भाव्येताम्, भाव्यन्ताम् आदि। लृट् में अभाव्यत, अभाव्येताम्, अभाव्यन्त आदि। विधिलिङ् में भाव्येत, भाव्येयाताम्, भाव्येरन् आदि रूप बनते हैं।

आशीर्लिङ् में- चिण्वदिट् के पक्ष में णि का लोप करके भाविषीष्ट, भाविषीयास्ताम्, भाविषीरन् आदि बनते हैं तो चिण्वदिट् न होने के पक्ष में भावयिषीष्ट, भावयिषीयास्ताम्, भावयिषीरन् आदि रूप बना लिए जाते हैं। इसी तरह लृङ् में चिण्वदिट् के पक्ष में अभावि, अभाविषाताम्, अभाविषत और उसके अभाव में अभावि, अभावयिषाताम्, अभावयिषत आदि रूप बन जाते हैं। लृङ् में चिण्वदिट्पक्षे- अभाविष्यत और उसके अभाव में अभावयिष्यत आदि।

अब सन्नन्त धातु से कर्म या भाव में प्रत्यय करने पर कैसे रूप बनते हैं? इसका विवेचन करते हैं। यदि धातु अकर्मक है तो सन् प्रत्यय करने के बाद भी सन्नन्त धातु अकर्मक ही रहेगी और धातु सकर्मक हो तो सन्नन्त भी सकर्मक ही होगी। अतः सन्नन्त अकर्मक धातुओं से भाव में और सन्नन्त सकर्मक धातुओं से कर्म में लकार होंगे। इसी तरह यङन्त और यङ्लुगन्त के विषय में भी जानना चाहिए। इसीलिए रामेण भूयते की तरह सन्नन्त भू का रामेण बुभूष्यते, यङन्त भू का रामेण बोभूष्यते और यङ्लुगन्त भू का रामेण बोभूयते आदि भाववाच्य में ही रूप बनेंगे किन्तु ण्यन्त भू धातु का तो रामेण श्यामो भाव्यते आदि कर्मवाच्य में रूप बनते हैं।

भू धातु से इच्छा अर्थ में धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा से सन् प्रत्यय होकर सन्यङोः से द्वित्व आदि हो जाने पर बुभूष बनता है। उसकी धातुसंज्ञा होती है। अकर्मक होने के कारण कर्ता या भाव में प्रत्यय होकर कर्तृवाच्य या भाववाच्य के रूप बनते हैं। कर्तरि प्रयोग तो देवदत्तः बुभूषित है किन्तु भाव के प्रयोग में बुभूष इस सन्नन्त धातु से लट्, त, यक् करके बुभूष+यत बनता है। यहाँ पर अतो लोपः से षकारोत्तरवर्ती अकार का लोप करके टि को एत्व करने पर बुभूष्यते बन जाता है। इसका वाक्य में प्रयोग- तेन बुभूष्यते अर्थात् उससे होने की इच्छा की जाती है।

लिट् में बुभूष से आम्, अतो लोपः से अकार का लोप, लिट् का लुक्, क्, भू, अस् का अनुप्रयोग आदि करके बुभूषाञ्चक्रे, बुभूषाम्बभूवे, बुभूषामासे।

लृट् में बुभूष से चिण्वदिट् करने के पक्ष में भी बुभूषिता बनता है और चिण्वदिट् न होने के पक्ष में भी वलादिलक्षण इट् होकर बुभूषिता ही बनता है। इस तरह

लृट् के रूपों में अन्तर नहीं है। अतो लोपः से अकार का लोप करना न भूलें। यहीं बात लृट् में भी होती है जिससे दोनों पक्षों में बुभूषिष्यते ही बनता है। लोट् में बुभूष्यताम्। लृट् में अबुभूष्यत। विधिलिङ्- बुभूष्यत। आशीर्लिङ् में बुभूषिषीष्ट। लृङ् का रूप- अबुभूषि और लृङ् का अबुभूषिष्यत।

इस तरह सन्नन्त से भाववाच्य में रूप बनाने की सामान्य प्रक्रिया बताकर अब यङन्त से भाववाच्य के रूप बतलाने का उपक्रम कर रहे हैं। बुभूष्यते।

भू धातु से क्रियासमभिहार अर्थ में धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् से यङ्, सन्यङोः से द्वित्व आदि करके गुणो यङ्लुकोः से गुण करने पर बोभूय बनता है। यह धातु अकर्मक है। अतः भाव अर्थ में लकार करके बोभूय+त बनता है। इससे सार्वधातुके यक् से यक् करके बोभूय+यत बना। अतो लोपः से बोभूय में यकारोत्तरवर्ती अकार का लोप करके बोभूय+यत बना। टि को एत्व करने पर बोभूयते सिद्ध हो जाता है।

सभी लकारों के रूप- बोभूयते। बोभूयाञ्चक्रे, बोभूयाम्बभूवे, बोभूयामासे। बोभूयिता। बोभूयिष्यते। बोभूयताम्। अबोभूयत। बोभूयेत। बोभूयिषीष्ट। अबोभूयि। अबोभूयिष्यत। ध्यान रहे कि भाव में प्रत्यय होने पर केवल प्रथमपुरुष और एकवचन ही होता है। इन रूपों को बनाने में कोई परेशानी नहीं आयेगी यदि पहले की प्रक्रिया तैयार है तो, अन्यथा तो अन्ध रे में तीर चलाने जैसा ही रहेगा।

भू धातु अकर्मक है। लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः के अनुसार इससे कर्ता और भाव अर्थ में ही लकार हो सकते हैं। कर्तरि लकार तो भ्वादि में बताई गई है इसी तरह ण्यन्त से कर्ता में, सन्नन्त से कर्ता में, यङन्त से कर्ता में और यङ्लुगन्त से कर्ता में भी तत्तत् प्रकरणों में हो चुके हैं। अभी यहाँ भावकर्मप्रक्रिया में केवल भू धातु, ण्यन्त भू धातु, सन्नन्त भू धातु और यङन्त भू धातु से भाव या कर्म के रूपों का सामान्य विवेचन किया गया। अब यङ्लुगन्त से भी भाव अर्थ में कैसे रूप बनते हैं, इसकी प्रक्रिया शुरू होती है।

बोभूयते। भू से यङ् करके उसका लुक् करने पर बोभू आप उस प्रकरण में बना चुके हैं। बोभू की धातुसंज्ञा करके भाव अर्थ में लृट् लकार, सार्वधातुक यक् प्रत्यय करके बोभू+यत बना है। टि को एत्व करके बोभूयते बन जाता है।

रूप- बोभूयते। बोभवाञ्चक्रे, बोभवाम्बभूवे, बोभवामासे। चिण्वदिट्पक्षे- वृद्धि, आवादेश होकर बोभाविता और न होने के पक्ष में वलादिलक्षण इट् होकर गुण करने पर बोभविता। इसी तरह लृट् में बोभाविष्यते, बोभविष्यते। लोट्- बोभूयताम्। लृङ्- अबोभूयत। विधिलिङ्- बोभूयेत। आशीर्लिङ्- बोभाविषीष्ट- बोभविषीष्ट। लिङ्- अबोभावि। लृङ्- अबोभाविष्यत, अबोभविष्यत।

स्तूयते विष्णुः। अदादिगण में ष्टुञ् स्तुतौ धातु पठित है। इसके वहाँ पर कर्तरि प्रयोग स्तौति, स्तुतः, स्तुवन्ति आदि होते हैं। सकर्मक होने से इससे कर्म में लकार होकर स्तूयते आदि बनते हैं। स्तु से लृट्, त, यक्, एत्व आदि करके स्तु+यते बना है। अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः से दीर्घ होकर स्तूयते बनता है। इसका कर्ता तृतीयान्त होगा। स्तूयते विष्णुर्भक्तेन। यह धातु सकर्मक है। भक्त से विष्णु की स्तुति की जाती है। लिट् में शर्पूर्वाः खयः लगकर तुष्टुवे ही बनता है क्यों कि धातु के एकाच् होने के कारण आम्

.....

आदि नहीं होते। लुट में चिण्वदिट् और उसके अभाव में दो-दो रूप-स्ताविता, स्तोता। इसी तरह लुट् में भी- स्ताविष्यते, स्तोष्यते। लोट् में - स्तूयताम्, स्तूयेताम्, स्तूयन्ताम्। लङ्- अस्तूयत, अस्तूयेताम्, अस्तूयन्त आदि। विधिलिङ्- स्तूयेत। आशीर्लिङ्- स्ताविषीष्ट, स्तोषीष्ट। लुङ्- अस्तावि, अस्ताविषाताम्-अस्तोषाताम्, अस्ताविषत-अस्तोषत आदि। लुङ्- अस्ताविष्यत, अस्तोष्यत।

अर्यते। ऋ गतौ यह धातु जुहोत्यादिगण में सकर्मक के रूप में पठित है। इससे कर्तृवाच्य में इयर्ति, इयृतः, इय्रति आदि रूप बनते हैं तो यहाँ कर्मवाच्य में यक् होकर ऋ+यत बना हुआ है। यक् में कित् होने के कारण गुण का निषेध होकर रिङ् शयग्लिङ्क्षु से ऋ को रिङ् आदेश प्राप्त था, उसे बाधकर के गुणोऽर्तिसंयोगाद्योः से गुण हुआ तो एत्व आदि करने के बाद अर्यते सिद्ध हुआ।

लट् में- अर्यते, अर्येते, अर्यन्ते आदि।

लिट् में- ऋ से लिट्, त, एश्, द्वित्व करके ऋ+ऋ+ए बनता है। अभ्यास को उरत् से अत्त्व, रपर होकर अर्+ऋ+ए में हलादिशेष होने पर अभ्यास अकार का अत आदेः से दीर्घ होकर आ+ऋ+ए हुआ। ऋ को यण् होकर आ+र्+ए बना। वर्णसम्मेलन होकर आरे सिद्ध हुआ। आरे, आराते, आरिरे, आरिषे, आराथे, आरिढ्वे-आरिध्वे, आरे, आरिवहे, आरिमहे।

लुट्- में चिण्वदिट् के विकल्प से होने से आरिता-अर्ता। लृट्- ऋद्धनोः स्ये से इट्- आरिष्यते, अरिष्यते। लोट्- अर्यताम्। लङ्- आर्यत। विधिलिङ्- अर्येत। आशीर्लिङ्- आरिषीष्ट-ऋषीष्ट। लुङ्- आरि, आरिषाताम्-आर्षाताम्, आरिषत-आर्षत आदि। लृङ्- आरिष्यत-अरिष्यत आदि।

स्मर्यते। भ्वादि में परस्मैपदी स्मृ स्मरणे धातु है। उससे लट्, कर्म में यक्, ऋतश्च संयोगादेर्गुणः से गुण आदि करके स्मर्यते बन जाता है। लिट् में- सस्मरे। आगे- स्मारिता-स्मर्ता। स्मारिष्यते-स्मरिष्यते। स्मर्यताम्। अस्मर्यत। स्मर्येत। स्मारिषीष्ट, स्मृषीष्ट। अस्मारि, अस्मारिषाताम्-अस्मृषाताम्,, अस्मारिषत-अस्मृषत। अस्मारिष्यत-अस्मरिष्यत।

अब स्रंसु( सन्सु ) जो भ्वादिगणीय अकर्मक आत्मनेपदी है, उससे भाव अर्थ में लकार होता है। लट् में स्रन्स्+यत बनने के बाद यक् के कित् होने के कारण अनिदितां हल उपधायाः विङ्ति से उपधा के नकार का लोप करके टि को एत्व करने पर स्रस्यते सिद्ध होता है। आगे के लकारों में सस्रंसे, स्रंसिता, स्रंसिष्यते, स्रस्यताम्, अस्रस्यत, स्रस्येत, स्रंसिषीष्ट, अस्रंसिष्ट, अस्रंसिष्यत आदि रूप बनते हैं। यक् होने के स्थलों में कित् को मानकर नकार का लोप होता है, अन्यत्र नहीं।

इदितस्तु नन्द्यते अर्थात् इदित् धातु में तो नकार का लोप नहीं हो सकता क्योंकि नकारविधायक सूत्र अनिदिताम् कहता है। टुनदि समृद्धौ से अनुबन्धलोप होने के बाद इदित् होने के कारण इदितो नुम् धातोः से नुम् होकर के नन्द् बना हुआ है। इसीलिए उसके नकार का लोप नहीं होता। अतः नन्द्यते, ननन्दे, नन्दिता, नन्दिष्यते, नन्द्यताम्, अनन्द्यत, नन्द्येत, नन्दिषीष्ट, अनन्दि, अनन्दिष्यत बनते हैं।

इन्यते। भ्वादि में यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु धातु पठित है। उससे कर्मवाच्य में लट्, यक् करके यज+यत बना। वचिस्वपियजादीनां किति से यज् में यकार को

सम्प्रसारण होकर इकार बना। इज्+यत में एत्व होकर इज्यते बना। लिट्- ईजे। आगे- यष्टा। यक्ष्यते। इज्यताम्। ऐज्यत। इज्येत। यक्षीष्ट। अयाजि, अयक्षाताम्, अयक्षत। अयक्ष्यत। ७५५- तनोतेर्यकि। तनोते: पञ्चम्यन्तं, यकि सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। विड्वनोरनुनासिकस्यात् से आत् और ये विभाषा से विभाषा की अनुवृत्ति आती है।