च्लेरङ् वा स्यात्।
जृ, स्तन्भु, मुचु, म्लुचु, गुचु, ग्लुचु, ग्लुञ्चु और श्वि धातुओं से परे च्लि के स्थान पर विकल्प से अङ्-आदेश होता है।
अङ् में ङकार की इत्संज्ञा होकर अ शेष रह जाता है।
अस्तन्भत्, अस्तन्भीत्। लङ् में स्तन्भ् से तिप्, इकार का लोप, अट् का आगम, च्लि, उसके स्थान पर जृस्तन्भुमुचुम्लुचुगुचुग्लुचुग्लुञ्चुश्विभ्यश्च से विकल्प से अङ् आदेश करके अस्तन्भ्+अत् बना है। अङ् के ङित् होने के कारण उपधाभूत मकार स्थानीय नकार का अनिदितां हल उपधायाः किङ्ति से लोप होकर अस्तन्भ्+अत् बना। वर्णसम्मेलन
होकर अस्तभत् सिद्ध हुआ। अङ् न होने के पक्ष में च्लि के स्थान पर सिच् होकर इट् और ईट् आगम होने के बाद सकार का इट ईटि से लोप और सवर्णदीर्घ करके अस्तम्भीत् सिद्ध हो जाता है। इस तरह अङ् के पक्ष में अस्तभत्, अस्तभताम्, अस्तभन् और सिच् के पक्ष में अस्तम्भीत्, अस्तम्भिष्टाम्, अस्तम्भिषुः आदि रूप बनते हैं। लृङ् में अस्तम्भिष्यत्। ६९०- स्तन्भेः। षष्ठ्यन्तमेकपदं सूत्रम्। उपसर्गात् सुनोति० से उपसर्गात् तथा सहेः साडः सः से सः की अनुवृत्ति और अपदान्तस्य मूर्धन्यः एवं इण्कोः का अधिकार है।