Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 15
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VṛttiGovind
LSK 633
ओतो लोपविधायकं विधिसूत्रम्
ओतः श्यनि
Aṣṭādhyāyī 7.3.71
Vṛtti Varadarājācārya

लोपः स्यात्।

श्यति। श्यतः। श्यन्ति। शशौ। शशतुः। शाता। शास्यति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

शो तनूकरणे। शो धातु पतला करना, छीलना अर्थ में है। शो में ओकार की अनुनासिक न होने से इत्संज्ञा भी नहीं होती है।

६३३- ओतः श्यनि। ओतः षष्ठ्यन्तं, श्यनि सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। घोर्लोपो लेटि वा से लोपः की अनुवृत्ति आती है।

श्यन् के परे होने पर धातु के अन्त में विद्यमान ओकार का लोप होता है।

श्यति। शो धातु से लट्, तिप्, श्यन् करके शो+यति बना। ओतः श्यनि से ओकार का लोप होने पर श्+यति बना, वर्णसम्मेलन होने पर श्यति सिद्ध हुआ। इस प्रकार लट् लकार के रूप बनते हैं- श्यति, श्यतः, श्यन्ति। श्यसि, श्यथः, श्यथ। श्यामि, श्यावः, श्यामः।

शशौ। शो धातु से लिट्, तिप्, णल्, अ होने के बाद शो+अ बना। यहाँ पर श्यन् न होने के कारण शित् नहीं है और शो धातु उपदेश अवस्था में एजन्त है। अतः आदेच उपदेशेऽशिति से आत्व हुआ, शा+अ बना। आत औ णलः से अकार के स्थान पर ओकार आदेश, शा+औ बना। शा को द्वित्व, शाशा+औ, अभ्याससंज्ञा करके ह्रस्वः से प्रथम शा के आकार को ह्रस्व होकर शशा+औ बना। पा-पाने धातु से पपौ की तरह शशा+औ में वृद्धिरेचि से वृद्धि हुई- शशौ।

णल् के परे होने पर शशौ और शेष में द्वित्व आदि करने के बाद आतो लोप इटि च से आकार का लोप और वर्णसम्मेलन करके बनते हैं- शशौ, शशतुः, शशुः। शशिथ-शशाथ, शशथुः, शशा। शशौ, शशिव, शशिम।

लृट् में भी आदेच उपदेशेऽशिति से आत्व होता है। शाता, शातारौ, शातारः। शातासि, शातास्थः, शातास्थ। शातास्मि, शातास्वः, शातास्मः। लृट् में- शास्यति, शास्यतः, शास्यन्ति। शास्यसि, शास्यथः, शास्यथ। शास्यामि, शास्यावः, शास्यामः। लृट् में- श्यतु-श्यतात्, श्यताम्, श्यन्तु। श्य-श्यतात्, श्यतम्, श्यत। श्यानि, श्याव, श्याम। लृङ्- अश्यत्, अश्यताम्, अश्यन्। अश्यः, अश्यतम्, अश्यत। अश्यम्, अश्याव, अश्याम। विधिलिङ्- श्येत्, श्येताम्, श्येयुः। श्येः, श्येतम्, श्येत। श्येयम्, श्येव, श्येम।

आशीर्लिङ् में शित् न होने के कारण आदेच उपदेशेऽशिति से आत्व करके शायात्, शायास्ताम्, शायासुः। शायाः, शायास्तम्, शायास्त। शायासम्, शायास्व, शायास्म बन जाते हैं।