Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
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VṛttiGovind
LSK 613
दीर्घविधायकं विधिसूत्रम्
हलि च
Aṣṭādhyāyī 8.2.77
Vṛtti Varadarājācārya

रेफवान्तस्य धातोरुपधाया इको दीर्घो हलि। पिपूर्तः। पिपुरति। पपार।

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लुङ्- अहैषीत्, अहैष्टाम्, अहैष्ट, अहैषीः, अहैष्टम्, अहैष्ट, अहैषम्, अहैष्व, अहैष्म।

लृङ्- अहेष्यत्, अहेष्यताम्, अहेष्यन्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

पृ पालनपूरणयोः। पृ धातु पालन करना और पूर्ण करना अर्थ में है। दीर्घ ऋकारान्त है। दीर्घ-ऋकारान्त होने से इसको इट् हो जाता है अर्थात् सेट् है।

६१३- हलि च। हलि सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। सिपि धातो रुर्वा से धातोः तथा र्वोरुपधाया दीर्घ इकः इस पूरे सूत्र की अनुवृत्ति आती है।

हल् के परे होने पर रेफान्त और वकारान्त धातु की उपधा रूप इक् को दीर्घ होता है।

र्वोरुपधाया दीर्घ इकः यह सूत्र पदान्त में दीर्घ करता है और यह सूत्र अपदान्त में भी हल् के परे होने पर दीर्घ करता है। दोनों सूत्रों में बस इतना ही अन्तर है।

पिपूर्तः। तस् में अर्तिपिपत्योश्च से इत्व करने के बाद पि+पृ+तस् बना है।