Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 586
गाङ्गादेशविधायकं विधिसूत्रम्
गाङ् लिटि
Aṣṭādhyāyī 2.4.49
Vṛtti Varadarājācārya

इङ् अध्ययने॥२०॥ इङिकावध्युपसर्गतो न व्यभिचरतः।

अधीते। अधीयाते। अधीयते।

.....

इङ्गे गाङ् स्याल्लिटि। अधिजगे। अधिजगाते। अधिजगिरे। अध्येता।

अध्येष्यते। अधीताम्। अधीयाताम्। अधीयताम्। अधीष्व। अधीयाथाम्।

अधीध्वम्। अध्ययै। अध्ययावहै। अध्ययामहै। अध्यैत। अध्यैयाताम्।

अध्यैयत। अध्यैथाः। अध्यैयाथाम्। अध्यैध्वम्। अध्यैयि। अध्यैवहि।

अध्यैमहि। अधीयीत। अधीयीयाताम्। अधीयीरन्। अध्येषीष्ट।

.....

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

इङ् अध्ययने। इङ् धातु अध्ययन करना अर्थात् पढ़ना अर्थ में है। ङकार की इत्संज्ञा होती है, इ शेष रहता है। यह धातु और इक् स्मरणे धातु अधि उपसर्ग के विना प्रयोग नहीं किये जाते अर्थात् इन दो धातुओं के पूर्व में अधि उपसर्ग लगाकर ही प्रयोग किया जाता है।

अधीते। अधि पूर्वक इ से लट्, त, शप्, उसका लुक् करके अधि+इ+त बना। सार्वधातुकमपित् से ङिद्वत् होने के कारण विङिति च से गुण का निषेध, टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व होकर इते बना। अधि+इते में सवर्णदीर्घ होने पर अधीते बना। द्विवचन में

अधि+इ+आते है, अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङ्कुवङौ से धातु के इकार को इयङ् होकर

इयाते बना। अधि+इयाते में सवर्णदीर्घ होकर अधीयाते बनता है। इसी तरह बहुवचन में भी

अत् आदेश, इयङ्, सवर्णदीर्घ होकर अधीयते बनता है।

लट्- अधीते, अधीयाते, अधीयते, अधीषे, अधीयाथे, अधीध्वे, अधीये, अधीवहे, अधीमहे।

५८६- गाङ् लिटि। गाङ् प्रथमान्तं, लिटि सप्तम्यन्तं (विषये सप्तमी), द्विपदमिदं सूत्रम्।

इङ्श्च से इङ्: की अनुवृत्ति है।

लिट् की विवक्षा में इङ् धातु के स्थान पर गाङ् आदेश होता है।

लिटि यह पद विषय-सप्तमी होने के कारण लिट् लकार की विवक्षा में गाङ् आदेश

होता है। इसके ङकार की इत्संज्ञा होती है। आत्मनेपदार्थ ङित्करण है। यद्यपि इङ् में ङित् होने

से स्थानिवद्धावेन गा में ङित्व आ जाता, तथापि गाङ्कुटादिभ्योऽञ्णिन् ङित् इस सूत्र में केवल

इसी का ग्रहण हो, अन्य गा का ग्रहण न हो, इसको जताने के लिए इसे ङित् किया गया है।

अधिजगे। अधि-पूर्वक इ-धातु से लिट् की विवक्षा में गाङ् लिटि से गा

आदेश, लिट्, त, एश् आदेश, द्वित्व करके अधि+गागा+ए बना। ह्रस्व, कुहोश्चुः से चुत्व

करके अधि+जगा+ए बना। आतो लोप इटि च से आकार का लोप करके अधिजगे सिद्ध

हुआ। इसी तरह आगे भी बनेंगे।

लिट्- अधिजगे, अधिजगाते, अधिजगिरे, अधिजगिषे, अधिजगाथे, अधिजगिध्वे, अधिजगे,

अधिजगिवहे, अधिजगिमहे।

लृट् में अधि+इ+ता है, धातु के इकार को सार्वधातुक गुण होकर अधि+एता

बना। यण् होकर अध्येता बनता है। अध्येता, अध्येतारौ, अध्येतारः, अध्येतासे, अध्येतासाथे,

अध्येताध्वे, अध्येताहे, अध्येतास्वहे, अध्येतास्महे।

लृट् में भी धातु को गुण और स्य के सकार को षत्व होकर अधि+एष्यते में

यण् करके रूप बनते हैं। अध्येष्यते, अध्येष्येते, अध्येष्यन्ते, अध्येष्यसे, अध्येष्येथे, अध्येष्यध्वे,

अध्येष्ये, अध्येष्यावहे, अध्येष्यामहे।

लोट् में लट् की तरह अधीते रूप बना कर आमेतः से आम् आदि करके रूप

बनते हैं- अधीताम्, अधीयाताम्, अधीयताम्, अधीष्व, अधीयाथाम्, अधीध्वम्, अध्ययै,

अध्ययावहै, अध्ययामहै।

लङ् में आट् करके धातु के ईकार के साथ आटश्च से वृद्धि करने पर

अधि+ऐत बनता है। इसके बाद यण् आदि करके रूप बनते हैं- अध्यैत, अध्यैयाताम्,

अध्यैयत, अध्यैथाः, अध्यैयाथाम्, अध्यैध्वम्, अध्यैयि, अध्यैवहि, अध्यैमहि।

विधिलङ् में अधि+इत बनने पर सीयुट् और सुट्, दोनों सकारों का लोप और इय् के यकार का लोप करके अधि+इ+ईत होने पर धातु के इकार के स्थान पर इयङ् करने से अधि+इय्+ईत बनता है। सवर्णदीर्घ करके वर्णसम्मेलन करने पर अधीयीत सिद्ध होता है। अधीयीत, अधीयीयाताम्, अधीयीरन्,, अधीयीथाः, अधीयीयाथाम्, अधीयीध्वम्, अधीयीय, अधीयीवहि, अधीयीमहि।

आशीर्लिङ् में सीयुट्, सुट्, आर्धधातुकगुण, यण् और षत्व करने पर अध्येषीष्ट बनता है। अध्येषीष्ट, अध्येषीयास्ताम्, अध्येषीरन्, अध्येषीष्ठाः, अध्येषीयास्थाम्, अध्येषीढ्वम्, अध्येषीय, अध्येषीवहि, अध्येषीमहि।