Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 562
अतिदेशविधायकमधिकारसूत्रम्
असिद्धवदत्राभात्
Aṣṭādhyāyī 6.4.22
Vṛtti Varadarājācārya

इत ऊर्ध्वम् आपादसमाप्तेराभीयम्, समानाश्रये तस्मिन् कर्तव्ये तदसिद्धम्।

इति जस्यासिद्धत्वात्र हेर्लुक्। जहि, हतात्। हतम्। हत। हनानि। हनाव।

हनाम। अहन्। अहताम्। अघ्नन्। अहन्। अहतम्। अहत। अहनम्।

अहन्व। अहन्म। हन्यात्। हन्याताम्। हन्युः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५६२- असिद्धवदत्राभात्। असिद्धवत् अव्ययपदम्, अत्र अव्ययपदम्, आ अव्ययपदं, भात् पञ्चम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्।

किसी आश्रय को लेकर किया गया आभीय कार्य पुनः दूसरे आभीय के प्रति असिद्ध होता है।

भस्य ६।४।१२९॥ इस सूत्र का अधिकार चतुर्थपाद की समाप्ति पर्यन्त है। असिद्धवदत्राभात् से जहाँ तक भसंज्ञा का अधिकार है उन सूत्रों के कार्य को आभीय कहते हैं। भम् अभिव्याप्य आभीयम्। आभीये कर्तव्ये आभीयम् असिद्धम्। समान है आश्रय जिसका अर्थात् जिन कार्यों का निमित्त समान हो, उन्हें समानाश्रय कहते हैं। समान आश्रय में यदि दूसरा आभीय कार्य करना हो तो पहला आभीय कार्य असिद्ध होता है। जहि इस प्रयोग में दो सूत्र आभीय के अन्तर्गत आते हैं- हन्तेर्जः ६.४.३६ और अतो हेः ६.४.१०५। पहले प्रवृत्त होने वाला सूत्र हन्तेर्जः है और उत्तर सूत्र अतो हेः है। यहाँ पर अतो हेः से हि के लुक् की कर्तव्यता में हन्तेर्जः का कार्य असिद्ध होता है। इसीलिए हि का लुक् नहीं हो पाता है। अन्यथा ज को अदन्त मान कर हि का लुक हो जाता और जहि के स्थान पर ज ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता क्योंकि ज आदेश और हि के लुक् समानाश्रय आभीय कार्य हैं। ज आदेश का आश्रय निमित्त(प्रकृति) हन् धातु और प्रत्यय दोनों ही हैं एवं हि-लोप का आश्रय-निमित्त भी प्रकृति-अदन्त अङ्ग ज(हन्) और प्रत्यय दोनों ही हैं। अतः दोनों समानाश्रय आभीय कार्य होने से, पहले किया हुआ आभीय ज आदेश बाद में प्राप्त आभीय हिलोप करते समय असिद्ध(के समान) हो जाता है। असिद्ध होने से हि-लोप के प्रति हन् ही दीखता है। अतः अतो हेः से लोप नहीं होता।

जहि, हतात्। हन् धातु से लोट्, मध्यमपुरुष का एकवचन सिप्, शप्, उसका लुक्, सि के स्थान पर हि आदेश, हन्तेर्जः से हन् धातु के स्थान पर ज आदेश होने पर ज+हि बना। असिद्धवदत्राभात् से पूर्वशास्त्र हन्तेर्जः के असिद्ध होने के कारण अतो हेः से हि का लुक् नहीं हुआ। जहि ही रह गया। तातङ् आदेश होने के पक्ष में हि के अभाव में ज आदेश भी नहीं होता है किन्तु तातङ् के डित् होने के कारण अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो झलि विडन्ति से अनुनासिक नकार का लोप होने पर हतात् यह सिद्ध हो जाता है। आगे हतम्, हत, हनानि भी सरल ही हैं। हनाव और हनाम में आट् आगम होने के कारण हन्+आव और हन्+आम है। झलादि न मिलने के कारण अनुनासिकलोप नहीं हुआ। इस तरह से लोट् में रूप बने- हन्तु-हतात्, हताम्, घ्नन्तु, जहि-हतात्, हतम्, हत, हनानि, हनाव, हनाम।

अहन्। लङ् में अट् आगम, तिप्, शप्, उसका लुक् करने के बाद अहन्+त् है। तकार का संयोगान्तस्य लोपः से लोप होकर अहन् बना।

अहताम्। तस् और उसके स्थान पर ताम् आदेश होने के बाद अहन्+ताम् है। ताम् के परे होने पर अनुनासिकलोप होकर अहताम् बनता है। बहुवचन में अहन्+अन् है। उपधालोप, कुत्व करके अघ्नन् बनता है।

सिप् में भी इकार के लोप के बाद सकार का संयोगान्तलोप होकर अहन् ही बनता है। लङ् के रूप- अहन् अहताम्, अघ्नन्, अहन्, अहतम्, अहत, अहनम्, अहन्व, अहन्म।

विधिलिङ्- हन्यात्, हन्याताम्, हन्युः, हन्याः, हन्यातम्, हन्यात, हन्याम्, हन्याव, हन्याम।