Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 560
कुत्वविधायकं विधिसूत्रम्
अभ्यासाच्च
Aṣṭādhyāyī 7.3.55
Vṛtti Varadarājācārya

अभ्यासात्परस्य हन्तेर्हस्य कुत्वं स्यात्।

जघनिथ, जघन्थ। जघन्थुः। जघ्न। जघान, जघन। जघ्निव। जघ्निम।

हन्ता। हनिष्यति। हन्तु, हतात्। हताम्। घ्नन्तु।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अभ्यास से परे भी हन् धातु के हकार के स्थान पर कवर्ग आदेश होता है।

हो हन्तेर्जिन्नेषु जित्, णित् प्रत्यय और नकार के परे ही कुत्व करता है। जहाँ ऐसा नहीं है वहाँ अभ्यास से परे हन् के हकार को कुत्व का विधान इस सूत्र के द्वारा किया गया है।

जघनिथ, जघन्थ। हन् धातु के अनिट् होने पर भी थल् में भारद्वाजनियम से विकल्प से इट् होता है। इट् और अनिट् दोनों पक्ष में हो हन्तेर्जिन्नेषु से कुत्व की प्राप्ति नहीं थी। अतः अभ्यासाच्च से हकार को कुत्व होकर जघनिथ, जघन्थ ये दो रूप बने। शेष रूप सरल ही हैं। लिट्- जघान, जघ्नुः, जघ्नुः, जघनिथ-जघन्थ, जघन्थुः, जघ्न, जघान-जघन, जघ्निव, जघ्निम।

लुट्- हन्ता, हन्तारौ, हन्तारः, हन्तासि, हन्तास्थः, हन्तास्थ, हन्तास्मि, हन्तास्वः, हन्तास्मः।

लृट् में- ऋद्धनोः स्ये से इट् का आगम होता है। हनिष्यति, हनिष्यतः, हनिष्यन्ति, हनिष्यसि, हनिष्यथः, हनिष्यथ, हनिष्यामि, हनिष्यावः, हनिष्यामः।

हन्तु, हतात्। लोट् में हन्ति बनाकर एरुः से उत्व करके हन्तु बनता है किन्तु तुह्योस्तातङ्ङाशिष्यन्यतरस्याम् से तातङ् होने के पक्ष में हन्+तात् है। नकार का अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो झलि क्ङिति से लोप होकर हतात् भी बनता है। आगे हताम्, घ्नन्तु सरल ही हैं।