Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 559
अनुनासिकलोपविधायकं विधिसूत्रम्
अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिक लोपो झलि क्ङिति
Aṣṭādhyāyī 6.4.37
Vṛtti Varadarājācārya

हन हिंसागत्योः॥२॥ हन्ति।

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अनुनासिकान्तानामेषां वनतेश्च लोपः स्याज्झलादौ किति ङिति परे।

यमि-रमि-नमि-गमि-हनि-मन्यतयोऽनुदात्तोपदेशाः।

तनु क्षणु क्षिणु ऋणु तृणु घृणु वनु मनु तनोत्यादयः। हतः। घ्नन्ति।

हंसि। हथः। हथ। हन्मि। हन्वः। हन्मः। जघान। जघ्नतुः। जघ्नुः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

हन हिंसागत्योः। हन धातु हिंसा करना और गति अर्थ में है। अकार की इत्संज्ञा होती है और हन् शेष रहता है।

हन्ति। हन् से लट्, तिप्, शप्, उसका लुक् करके हन्+ति है। नकार के स्थान पर नश्चापदान्तस्य झलि से अनुस्वार और अनुस्वार के स्थान पर अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः से परसवर्ण करके पुनः नकार ही हो जाता है, हन्ति।

५५९- अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो झलि विङ्ति। अनुदात्तः उपदेशे येषां ते अनुदात्तोपदेशाः। तनोतिर् आदियेषां ते तनोत्यादयः, बहुव्रीहिः। अनुदात्तोपदेशाश्च वनतिश्च तनोत्यादयश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वः अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादयः, तेषाम् अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनाम्। क् च ङ् च क्ङौ, तौ इतौ यस्य तत् विङ्त्, तस्मिन् विङ्ति। अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनां षष्ठ्यन्तम्, अनुनासिक इति लुप्तषष्ठीकं पदं, लोपः प्रथमान्तं, झलि सप्तम्यन्तं, विङ्ति सप्तम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्।

वन् धातु, अनुनासिकान्त अनुदात्तोपदेश धातु और अनुनासिकान्त तन् आदि धातुओं के अनुनासिक का लोप होता है झलादि कित् ङित् के परे होने पर।

अनुदात्त धातुओं की गणना भ्वादिप्रकरण में हो चुकी है। उनमें अनुनासिक वर्ण अन्त वाली अनुदात्त ये धातुएँ हैं- यम्, रम्, नम्, गम्, हन्, मन्। तनोत्यादि धातु हैं- तनु, क्षिणु, क्षणु, ऋणु, तृणु घृणु, वनु, मनु। यदि इन धातुओं से झलादि कित् ङित् परे हो तो धातु में विद्यमान अनुनासिक वर्ण का लोप हो जाता है।

हतः। हन् से तस्, शप्, उसका लुक् करके हन्+तस् है। तस् अपित् सार्वधातुक होने के कारण उसे सार्वधातुकमपित् से ङित् हुआ है, तस् का तकार झल् में आता है और हन् धातु अनुनासिक अनुदात्तोपदेश है। अतः हन् के नकार का अनुदात्तोपदेश-वनति-तनोत्यादीनामनुनासिकलोपो झलि विङ्ति से लोप हो गया, ह+तस् बना। सकार का रुत्वविसर्ग होकर हतः सिद्ध हुआ।

घ्नन्ति। हन्+अन्ति में झलादि न होने के कारण अनुनासिक का लोप नहीं हुआ किन्तु गमहनजनखनघसां लोपः विङ्त्यनङि से उपधाभूत हन् के अकार का लोप हुआ, ह+न्+अन्ति बना। नकार के परे होने पर हो हन्तेर्जिग्नेषु से हकार को घकार आदेश होकर घ्+न्+अन्ति बना। वर्णसम्मेलन होकर घ्नन्ति सिद्ध हुआ। इस तरह से लट् के रूप बने- हन्ति, हतः, घ्नन्ति, हंसि, हथः, हथ, हन्मि, हन्वः, हन्मः।

जघान। हन् से लिट्, तिप्, णल् आदेश करके हन्+अ बना है। द्वित्व, हलादि शेष करके ह+हन्+अ बना। कुहोश्चुः से हकार को कुत्व होकर झकार और उसके स्थान पर अभ्यासे चर्च से जश्त्व होकर जकार होकर जहन्+अ बना। णित् परे मानकर हो

हन्तेर्जिन्नेषु से कुत्व होकर घकार हुआ, जघन्+अ बना। अत उपधाया से वृद्धि होकर जघान सिद्ध हुआ। आगे असंयोगाल्लिट् कित् से कित्व होने के कारण गमहनजनखनघसां लोपः क्ङित्यनङि से उपधालोप होने पर कुत्व होकर जघन्तुः, जघ्नुः आदि रूप बनते हैं। ५६०- अभ्यासाच्च। अभ्यासात् पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। हो हन्तेर्जिन्नेषु से हः और चजोः कु घिण्यतोः से कु की अनुवृत्ति आती है।