अदः परस्यापृक्तसार्वधातुकस्य अट् स्यात् सर्वमतेन।
आदत्। आत्ताम्, आदन्। आदः। आत्तम्। आत्त। आदम्। आद्ध। आद्म।
अद्यात्। अद्याताम्, अद्युः। अद्यात्। अद्यास्ताम्। अद्यासुः।
तुह्योस्तातङ्ङाशिष्यन्यतरस्याम् से तातङ् आदेश करने पर भ्वादि की तरह दो रूप बनते हैं- अत्तु-अत्तात्। तस् में अत्ताम् और झि में अदन्तु बनते हैं।
५५७- अदः सर्वेषाम्। अदः षष्ठ्यन्तं, सर्वेषाम् षष्ठ्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में अस्तिसिचोऽपृक्ते से अपृक्ते की षष्ठी विभक्ति में बदलकर, तुरुस्तुशम्यमः सार्वधातुके से सार्वधातुके को षष्ठी में बदलकर सार्वधातुकस्य और अद् गार्ग्यगालवयोः से अट् की अनुवृत्ति आती है।
अद् धातु से परे अपृक्तसंज्ञक सार्वधातुक प्रत्यय को अट् आगम होता है, सभी आचार्यों के मत में।
अष्टाध्यायीक्रम में इस सूत्र से पहले गालव और गार्ग्य ऋषि के मतों का प्रसंग चल रहा था, जिसके कारण विकल्प से हो रहा था। उस विकल्प को रोकने के लिए सूत्रकार ने यहाँ सर्वेषाम् यह पद देकर सभी आचार्यों के मत में अट् होता है, किसी एक आचार्य के मत में नहीं। अतः विकल्प से नहीं होगा, यह बताया है। केवल ङित् लकार सम्बन्धी तिप् और सिप् में ही इकार का इतश्च से लोप होने के कारण अपृक्त मिलता है। अतः यह सूत्र ङित् लकार में तिप् और सिप् का मात्र विषय है। अट् आगम टित् होने के कारण तिप् के त् और सिप् के स् के पहले रहेगा।
आदत्। अद् से लङ् लकार, तिप्, अनुबन्धलोप, आडजादीनाम् से धातु को आट् आगम, शप्, उसका लुक्, ति में इकार का इतश्च से लोप करके आ+अद्+त् बना। त् की अपृक्तसंज्ञा करके अदः सर्वेषाम् से उसको अट् आगम किया तो आ+अद्+अत् बना। आ+अद् में आटश्च से वृद्धि करके वर्णसम्मेलन करने पर आदत् सिद्ध हुआ। सिप् में आदः बनता है। अन्यत्र अट् आगम नहीं होता है।
इस प्रकार से अद् धातु के लङ् लकार में निम्नानुसार रूप बनते हैं- आदत्, आत्ताम्, आदन्। आदः, आत्तम्, आत्त। आदम्, आद्व, आद्व।
अद्यात् अद्याताम्। अद् धातु से विधिलिङ्, तिप्, इकार का लोप, शप्, उसका लुक्, यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च से यासुट् आगम, अनुबन्धलोप, अद्+यास्+त् बना। सकार का लिङः सलोपोऽन्त्यस्य से लोप हुआ, वर्णसम्मेलन हुआ- अद्यात्। इसी प्रकार अद्याताम् भी बनेगा। अद्+तस्, शप्, लुक्, यासुट्, तामादेश, सलोप, वर्णसम्मेलन- अद्याताम् बना।
अद्युः। अद् धातु से विधिलिङ्, झि, अन्त् आदेश को बाधकर झेर्जुस् से जुस् आदेश, अनुबन्ध लोप, शप्, उसका लुक्, यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च से यासुट् आगम, अनुबन्धलोप, अद्+यास्+उस् बना। यास् के सकार का लिङः सलोपोऽन्त्यस्य से लोप हुआ, अद्+या+उस् बना। या+उस् में उस्यपदान्तात् से पररूप होकर युस् बना, अद्+युस् में वर्णसम्मेलन हुआ और सकार को रुत्वविसर्ग हुआ- अद्युः।
अद् धातु के विधिलिङ् के रूप- अद्यात्, अद्याताम्, अद्युः। अद्याः, अद्यातम्, अद्यात। अद्याम्, अद्याव, अद्याम।
आशीर्लिङ् में अद्यात्, अद्यास्ताम्, अद्यासुः। अद्याः, अद्यास्तम्, अद्यास्त। अद्यासम्, अद्यास्व, अद्यास्म।