Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 556
हेर्धिर्विधायकं विधिसूत्रम्
हुझल्भ्यो हेर्धिः
Aṣṭādhyāyī 6.4.101
Vṛtti Varadarājācārya

होईलन्तेभ्यश्च हेर्धिः स्यात्।

अद्धि-अत्तात्। अत्तम्। अत्त। अदानि। अदाव। अदाम।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

क्+ष्=क्ष् हो गया, जक्ष्+अतुस् बना, वर्णसम्मेलन हुआ, जक्ष्तुस् बना, सकार को रुत्वविसर्ग हुआ तो जक्ष्तुः सिद्ध हुआ। असंयोगाल्लिट् कित् से तिप्, सिप्, मिप् को छोड़कर शेष प्रत्ययों को किद्वद्भाव हुआ। अतः तिप्, सिप्, मिप् के अतिरिक्त अन्य प्रत्ययों के परे होने पर गमहनजनखनघसां लोपः क्डित्यनडि से उपधा के लोप होने पर जक्ष् बनाकर आगे वर्णसम्मेलन करें। इस तरह अद् धातु के घस्लृ आदेश होने के पक्ष में निम्नलिखित रूप सिद्ध हो जाते हैं- जघास, जक्ष्तुः, जक्षुः। जघसिथ, जक्ष्थुः, जक्ष। जघास-जघस, जक्षिव, जक्षिम।

लिट् में घस्लृ आदेश वैकल्पिक है। आदेश न होने के पक्ष में अद् को द्वित्व, हलादिशेष होने पर अअद् बना। अत आदेः से दीर्घ और आ+अद् में सवर्णदीर्घ करके आद् बन जाता है और आगे वर्णसम्मेलन होने पर निम्नलिखित रूप सिद्ध हो जाते हैं- आद, आदतुः, आदुः।

५५६- हुझल्भ्यो हेर्धिः। हुश्च झलश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वो हुझलः, तेभ्यो हुझल्भ्यः। हुझल्भ्यः पञ्चम्यन्तं, हेः षष्ठ्यन्तं, धिः प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।

हु और झलन्त धातुओं से परे हि के स्थान पर धि आदेश होता है।

अद् धातु झलन्त है।

अद्धि। अद् से लोट्, सिप्, शप्, उसका लुक्, सेह्यपिच्च से सि के स्थान पर हि आदेश, अद्+हि बना। हि के स्थान पर हुझल्भ्यो हेर्धिः से धि आदेश करके अद्धि सिद्ध हुआ। थस् और थ में अत्तम्, अत्त बनते हैं। मिप्, वस्, मस् में आडुत्तमस्य पिच्च से आट् का आगम होकर अद्+आमि, वर्णसम्मेलन-अदामि। वस् और मस् में आडागम, सकार का लोप करके अद्+आव, अद्+आम, वर्णसम्मेलन करके अदाव, अदाम। सिद्ध होते हैं।

अद् धातु के लोट् लकार के रूप- अत्तु-अत्तात्, अत्ताम्, अदन्तु, अद्धि-अत्तात्, अत्तम्, अत्त, अदानि, अदाव, अदाम।