लुक् स्यात्।
अत्ति। अत्तः। अदन्ति। अत्सि। अत्थः। अत्थ। अद्यि। अद्वः। अद्यः।
श्रीधरमुखोल्लासिनी
अब तिङन्तप्रकरण का दूसरा अदादिप्रकरण प्रारम्भ होता है। इस प्रकरण में अद् धातु पहला है, इसलिए इसे अदादिप्रकरण कहते हैं। अदादिगण की विशेषता यह है कि जैसे भ्वादिगण में धातु और तिप् आदि के बीच में शप् होता है, वैसे इस प्रकरण में शप् प्रत्यय होने के बाद उसका लुक्(लोप) होता है। भ्वादिगणीय धातुओं को शप्-विकरण धातु कहते हैं तो इस प्रकरण के धातुओं को शब्लुग्विकरण धातु कहते हैं।
अद भक्षणे। अद धातु भक्षण अर्थात् खाना अर्थ में है। अत्ति= खाता है। अद में अन्त अकार उदात्त स्वर वाला है और उसकी उपदेशोऽजनुनासिक इत् से इत्संज्ञा और तस्य लोपः से लोप होकर अद् बचता है। आत्मनेपद के लिए कोई निमित्त न होने के कारण परस्मैपदी है।
अद भक्षणे॥१॥
५५२- अदिप्रभृतिभ्यः शपः। अदिः प्रभृतिः(आदिः) येषां ते अदिप्रभृतयः, तेभ्यः अदिप्रभृतिभ्यः। अदिप्रभृतिभ्यः पञ्चम्यन्तं, शपः षष्ठ्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में ण्यक्षत्रियार्षजितो यूनि लुगणिजोः से लुक् की अनुवृत्ति आती है।
अदादिगण में पठित धातुओं से किये गये शप् का लुक् होता है।
लुक् भी लोप ही है। अन्तर इतना है कि लोप होने पर स्थानिवद्भाव या प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् आदि से शप् आदि मानकर अनेक कार्य हो सकते हैं किन्तु लुक् करने पर न लुमताङ्गस्य से निषेध होने से प्रत्ययलक्षण नहीं होता।
अत्ति। अद धातु में अकार के लोप होने के बाद अद् बचा, उससे लट्-लकार तिप् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, ति की तिङ्शित्सार्वधातुकम् से सार्वधातुकसंज्ञा, कर्तरि शप् से शप्, शप् का अदिप्रभृतिभ्यः शपः से लुक्, अद्+ति में दकार के स्थान पर खरि च से चर्त्व होकर तकार आदेश हुआ, अत्+ति बना, वर्णसम्मेलन हुआ- अत्ति बना। इसी प्रकार तस् में सकार को रुत्वविसर्ग करके अत्तः भी बनेगा। बहुवचन में झू के स्थान पर अन्त् आदेश करके