अनयोरवर्णस्य ओत्स्याड्ढलोपे। उवोढ। ऊहे। वोढ। वक्ष्यति। अवाक्षीत्।
अवोढाम्। अवाक्षुः। अवाक्षीः। अवोढम्। अवोढ। अवाक्षम्। अवाक्ष्व।
अवाक्ष्म। अवोढ। अवक्षाताम्। अवक्षत। अवोढाः। अवक्षाताम्। अवोढ्वम्।
अवक्षि। अवक्ष्वहि। अवक्ष्महि।
इति भ्वादयः॥१२॥
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ढकार के परे रहने पर पूर्व ढकार का लोप होता है।
५५१- सहिवहोरोदवर्णस्य। सहिश्च वह् च तयोरितरेतरद्वन्द्वः सहिवहौ, तयोः सहिवहोः।
सहिवहोः षष्ठ्यन्तम्, ओत् प्रथमान्तम्, अवर्णस्य षष्ठ्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। द्वलोपे पूर्वस्य
दीर्घोऽणः से उपयोगी अंश ढलोपे की अनुवृत्ति आती है।
ढकार का लोप हुआ हो तो सह् और वह् धातु के अकार के स्थान पर
ओकार आदेश होता है।
उवहिथ, उवोढ। वह् धातु हकारान्त अनुदात्तों की गणना में आता है। अतः
एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से अनिट् है किन्तु थल् में ऋतो भारद्वाजस्य से भारद्वाज के मत
में ऋदन्तभिन्न होने के कारण इट् हो जाता है, अन्यों के मत में नहीं होता। अतः विकल्प
से इट् हो जायेगा। यहाँ पर सिप् सम्बन्धी थल् होने के कारण स्थानिवद्भावेन यह भी पित्
है, अतः असंयोगाल्लिट् कित् से कित् नहीं हुआ। इसलिए लिट्यभ्यासस्योभयेषाम् से
अभ्यास को सम्प्रसारण होता है। इट् के परे रहने पर भी सम्प्रसारण हो रहा है और इट् न
होने पर भी सम्प्रसारण हो रहा है, जिससे उवहिथ और उवोढ ये दो रूप सिद्ध हो गये।
इट् न होने के पक्ष में उवह्+थ है। उवह् के हकार के स्थान पर हो ढः से ढकार आदेश
होकर उससे परे थकार के स्थान पर झषस्तथोर्धोऽधः से थकार आदेश हुआ और उवह्+थ
बना। ढकार से थकार के स्थान पर ष्टुना ष्टुः से ष्टुत्व होकर ढकार हुआ, उवह्+ढ बना।
ढो ढे लोपः से ढकार के परे होने पर पूर्व ढकार का लोप हुआ, उव+ढ बना। द्वलोपे पूर्वस्य
दीर्घोऽणः से उव के अकार को दीर्घ प्राप्त था, उसे बाधकर के सहिवहोरोदवर्णस्य से
अकार के स्थान पर ओकार आदेश होकर उवोढ सिद्ध हुआ। इट् होने के पक्ष में उवहिथ
बनता है।
आत्मनेपद में अपितु होने के कारण किद्वद्भाव होकर सम्प्रसारण करने पर ईजे की
तरह ऊहे, ऊहाते, ऊहिरे बनते हैं।
लुट् के दोनों पदों में हकार के स्थान पर हो ढः से ढकार आदेश होता है।
झषस्तथोर्धोऽधः से तास् के तकार के स्थान पर थकार आदेश होकर वह्+था बनता है।
ढकार से परे थकार के स्थान पर ष्टुना ष्टुः से ष्टुत्व होकर ढकार होकर वह्+ढा बनता
है। ढो ढे लोपः से ढकार के परे होने पर पूर्व ढकार का लोप, व+ढा में द्वलोपे पूर्वस्य
दीर्घोऽणः से उव के अकार को दीर्घ प्राप्त, उसे बाधकर सहिवहोरोदवर्णस्य से अकार के
स्थान पर ओकार आदेश होकर वोढा, वोढारौ, वोढारः, वोढासि, वोढासे आदि रूप
बनते हैं।
वक्ष्यति। लृट् के दोनों पदों में वह्+स्य में हो ढः से ढकार आदेश होकर वह्+स्य बनता है और षढोः कः सि से ढकार के स्थान पर ककार आदेश करके वक्+स्य बनता है। ककार से परे सकार को षत्व होकर वक्+ष्य बनता है। क्+ष् के संयोग में क्ष् होने के कारण वक्ष्य बन जाता है। आगे दोनों पदों के प्रत्यय तो हैं ही। इस तरह वक्ष्यति और वक्ष्यते ये रूप बनते हैं। विधिलिङ् में कोई विशेष नहीं है। रूप- वहेत्, वहेत आदि बनते हैं।
आशीर्लिङ् के परस्मैपद में यासुट् के कित् होने के कारण वचिस्वपियजादीनां किति से सम्प्रसारण होकर उह्यात् बनता है किन्तु आत्मनेपद में सीयुट् के कित् न होने के कारण सम्प्रसारण नहीं होता। अतः षत्व, कत्व, क्षत्व होकर वक्षीष्ट बनता है।
लृङ् के परस्मैपद में च्लि को सिच् होकर अयज्+स्+ईत् में वदव्रजहलन्तस्याचः से वृद्धि करके जकार को षत्व, षकार को कत्व, सिच् के सकार को षत्व करके अवाक्षीत् सिद्ध होता है। तस्, थस्, थ के परे रहने पर झषस्तथोर्धोऽधः से धकार आदेश, हो ढः से ढकार आदेश, एक ढकार का लोप, सहिवहोरोदवर्णस्य से ओकार आदेश होकर क्रमशः अवोढाम्, अवोढम्, अवोढ बनते हैं। शेष में हो ढः से ढकार होने के बाद षढोः कः सि से ककार आदेश होकर षत्व, क्षत्व आदि होते हैं। आत्मनेपद में अपृक्त के अभाव में ईट् नहीं होता और वृद्धि भी नहीं होती किन्तु अवह्+स्+त में सिच् के सकार का झलो झलि से लोप होता है। तकार को झषस्तथोर्धोऽधः से धत्व और धकार को ष्टुत्व होकर ढकार हो जाने के बाद पूर्व ढकार का लोप करके सहिवहोरोदवर्णस्य से ओकार आदेश करने पर अवोढ बनता है। तकार और धकार के स्थान पर धकार आदेश होने के कारण अवोढाः, अवोढ्वम्, बनते हैं।
लट्- वहति, वहते। लिट्-( परस्मैपद ) उवाह, ऊहतुः, ऊहुः, उवहिथ-उवोढ, ऊहथुः, ऊह, उवाह-उवह, ऊहिव, ऊहिम। ( आत्मनेपद ) ऊहे, ऊहाते, ऊहिरे, ऊहिषे, ऊहाथे, ऊहिढ्वे-ऊहिध्वे, ऊहे, ऊहिवहे, ऊहिमहे। लृट्- वोढा, वोढासि, वोढासे। लृट्- वक्ष्यति, वक्ष्यते। लोट्- वहतु, वहताम्। लङ्- अवहत्, अवहत। विधिलिङ्- वहेत्, वहेत। आशीर्लिङ्- उह्यात्, उह्यास्ताम्, उह्यासुः। वक्षीष्ट, वक्षीयास्ताम्, वक्षीरन्, वक्षीष्ठाः, वक्षीयास्थाम्, वक्षीध्वम्, वक्षीय, वक्षीवहि, वक्षीमहि। लृङ् ( परस्मैपद ) अवाक्षीत्, अवोढाम्, अवाक्षुः, अवाक्षीः, अवोढम्, अवोढ, अवाक्षम्, अवाक्ष्व, अवाक्ष्म। ( आत्मनेपद ) अवोढ, अवक्षाताम्, अवक्षत, अवोढाः, अवक्षाथाम्, अवोढ्वम्, अवक्षि, अवक्ष्वहि, अवक्ष्महि। लृङ्- अवक्ष्यत्, अवक्ष्यत।
अभ्यास
अब आप भ्वादिप्रकरण का आद्योपान्त अध्ययन करें और अच्छी तरह समझने के बाद ही अगले प्रकरण में प्रवेश करें। इस प्रकरण में जितने धातु बताये गये हैं, उनके रूप विना पुस्तक देखे अपनी पुस्तिका में उतारें और उसके बाद अपने गुरु जी को दिखायें या इस पुस्तक से मिलायें। आप यदि सारे रूप जान चुके हैं और लिख सकते हैं एवं प्रयोग भी कर सकते हैं तो तभी अदादिप्रकरण में प्रवेश करें। अन्यथा आगे बढ़ना व्यर्थ है।
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
तिङन्त-भ्वादि प्रकरण पूर्ण हुआ।
अथ-अदादयः