Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 548
कादेशविधायकं विधिसूत्रम्
षढोः कः सि
Aṣṭādhyāyī 8.2.41
Vṛtti Varadarājācārya

यक्ष्यति, यक्ष्यते। इज्यात्, यक्षीष्ट। अयाक्षीत्, अयष्ट।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

वह प्रापणे॥१॥ वहति, वहते। उवाह। ऊहतुः। ऊहुः। उवहिथ।

सम्प्रसारण होता है, तब द्वित्व आदि कार्य होते हैं। इयाज में पहले द्वित्व इसलिए हुआ कि लिट्यभ्यासस्योभयेषाम् यह सूत्र अभ्यास को ही द्वित्व करता है और द्वित्व करने के बाद ही अभ्यास बनता है।

सम्प्रसारण करने वाले इन दो सूत्रों में तिप्, सिप्, मिप् को छोड़कर अन्यत्र कित् के परे वचिस्वपियजादीनां किति यह सूत्र द्वित्व होने के पहले ही सम्प्रसारण करता है और लिट् के तिप्, सिप्, मिप् में लिट्यभ्यासस्योभयेषाम् यह सूत्र द्वित्व होने के बाद अभ्यास को सम्प्रसारण करता है। इस अन्तर को समझना आवश्यक है।

ईजतुः। यज् से लिट्, तस्, उसके स्थान पर अतुस् आदेश करके वचिस्वपियजादीनां किति से यज् में यकार को सम्प्रसारणसंज्ञक इकार आदेश और उसके बाद वाले अकार के बीच पूर्वरूप होकर केवल इकार ही बना। इस तरह यज् धातु इज् में बदल गया। अब इज्+अतुस् में इज् को द्वित्व होकर हलादिशेष होने पर इ+इज्+अतुस् बना। इ+इ में सवर्णदीर्घ होकर ईज्+अतुस् बना। वर्णसम्मेलन होकर ईजतुः सिद्ध हुआ। इसी तरह ईजुः भी बन जाता है।

इयजिथ, इयष्ठ। यज् जकारान्त अनुदात्तों की गणना में आता है। अतः एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से अनिट् है किन्तु थल् में ऋतो भारद्वाजस्य से भारद्वाज के मत में ऋदन्तभिन्न होने के कारण इट् हो जाता है, अन्यों के मत में नहीं होता। अतः विकल्प से इट् हो जायेगा। यहाँ पर सिप् सम्बन्धी थल् होने के कारण स्थानिवद्भावेन यह भी पित् है, अतः असंयोगाल्लिट् कित् से कित् नहीं हुआ। इस लिए लिट्यभ्यासस्योभयेषाम् से अभ्यास को सम्प्रसारण होता है। इट् के परे रहने पर भी सम्प्रसारण हो रहा है और इट् न होने पर भी सम्प्रसारण हो रहा है, जिससे इयजिथ और इयष्ठ ये दो रूप सिद्ध हो गये।

आत्मनेपद में पित् न होने के कारण नवों प्रत्ययों में कित्त्व होता है। अतः वचिस्वपियजादीनां किति से सम्प्रसारण होकर सम्प्रसारणाच्च से पूर्वरूप करके सवर्णदीर्घ करके ईजे, ईजाते, ईजिरे आदि रूप बनते हैं।

लुट् के दोनों पदों में यज्+ता में जकार के स्थान पर व्रश्चभ्रस्जसृजमृजमृजयजराज-भ्राजच्छशां षः से षकार आदेश होता है और षकार से परे तकार को ष्टुत्व करने पर यष्टा आदि रूप बनते हैं।

५४८- षढोः कः सि। षश्च ढ् च तयोरितरेतरद्वन्द्वः षढौ, तयोः षढोः। षढोः षष्ठ्यन्तं, कः प्रथमान्तं, सि सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।

सकार के परे होने पर षकार और ढकार के स्थान पर ककार आदेश होता है।

यक्ष्यति। लुट् के दोनों पदों में यज्+स्य में व्रश्चभ्रस्जसृजमृजमृजयजराजभ्राजच्छशां षः से षकार आदेश होकर यष्+स्य बनता है और षढोः कः सि से षकार के स्थान पर