Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 542
एत्वाभ्यासलोपविधायकं विधिसूत्रम्
तॄफलभजत्रपश्च
Aṣṭādhyāyī 6.4.122
Vṛtti Varadarājācārya

एषामत एत्वाभ्यासलोपश्च स्यात् किति लिटि सेटि थलि च।

त्रेषे। त्रपिता, त्रप्ता। त्रपिष्यते, त्रप्स्यते। त्रपताम्। अत्रपत। त्रपेत। त्रपिषीष्ट,

त्रप्सीष्ट। अत्रपिष्ट, अत्रप्त। अत्रपिष्यत, अत्रप्स्यत।

इत्यात्मनेपदिनः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५४२- तृफलभजत्रपश्च। तृश्च फलश्च भजश्च त्रप् च तेषां समाहारद्वन्द्वः तृफलभजत्रप्, तस्य तृफलभजत्रपः। तृफलभजत्रपः षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अत एकहल्मध्येऽनादेशादेर्लिटि से अतः, ध्वसोरेद्धावभ्यासलोपश्च से एत्, अभ्यासलोपः, च की और गमहनजनखनघसां लोपः विङ्त्यनङि से किति एवं थलि च सेटि की अनुवृत्ति आती है।

तृ, फल्, भज् और त्रप् धातुओं के अत् को एकार आदेश तथा अभ्यास का लोप होता है कित् लिट् और सेट् थल् के परे होने पर।

त्रेपे। त्रप् से लिट्, त, एश् आदेश, द्वित्व, हलादिशेष करके तत्रप्+ए बना। त्रप् में संयोग होने के कारण अप्राप्त एत्व और अभ्यास का लोप तृफलभजत्रपश्च से विधान हुआ अर्थात् त के लोप और त्रप् में अकार के स्थान पर एकार आदेश होकर त्रेप्+ए बना। वर्णसम्मेलन होकर त्रेपे सिद्ध हुआ।

लट्- त्रपते, त्रपेते, त्रपन्ते, त्रपसे, त्रपेथे, त्रपध्वे, त्रपे, त्रपावहे, त्रपामहे। लिट्- त्रेपे, त्रेपाते, त्रेपिरे, त्रेपिषे, त्रेपाथे, त्रेपिध्वे-त्रेब्ध्वे, त्रेपे-त्रेप्से, त्रेपिवहे-त्रेप्वहे, त्रेपिमहे-त्रेप्महे। लुट्- (इट् पक्षे) त्रपिता, त्रपितारौ, त्रपितारः, त्रपितासे, त्रपितासाथे, त्रपिताध्वे, त्रपिताहे, त्रपितास्वहे, त्रपितास्महे। (इडभावपक्षे) त्रप्ता, त्रप्तारौ, त्रप्तारः, त्रप्तासे, त्रप्तासाथे, त्रप्ताध्वे, त्रप्ताहे, त्रप्तास्वहे, त्रप्तास्महे। लुट्- (इट्पक्षे) त्रपिष्यते, त्रपिष्येते, त्रपिष्यन्ते, त्रपिष्यसे, त्रपिष्येथे, त्रपिष्यध्वे, त्रपिष्ये, त्रपिष्यावहे, त्रपिष्यामहे। इडभावपक्षे- त्रप्स्यते, त्रप्स्येते, त्रप्स्यन्ते, त्रप्स्यसे, त्रप्स्येथे, त्रप्स्यध्वे, त्रप्स्ये, त्रप्स्यावहे, त्रप्स्यामहे। लोट्- त्रपताम्, त्रपेताम्, त्रपन्ताम्, त्रपस्व, त्रपेथाम्, त्रपध्वम्, त्रपे, त्रपावहे, त्रपामहे। लङ्- अत्रपत, अत्रपेताम्, अत्रपन्त, अत्रपथाः, अत्रपेथाम्, अत्रपध्वम्, अत्रपे, अत्रपावहि, अत्रपामहि। विधिलिङ्- त्रपेत, त्रपेयाताम्, त्रपेरन्, त्रपेथाः, त्रपेयाथाम्, त्रपेध्वम्, त्रपेय, त्रपेवहि, त्रपेमहि। आशीर्लिङ्- (इट्पक्षे) त्रपिषीष्ट, त्रपिषीयास्ताम्, त्रपिषीरन्, त्रपिषीष्ठाः, त्रपिषीयास्थाम्, त्रपिषीध्वम्, त्रपिषीय, त्रपिषीवहि, त्रपिषीमहि। इडभावपक्षे- त्रप्सीष्ट, त्रप्सीयास्ताम्, त्रप्सीरन्, त्रप्सीष्ठाः, त्रप्सीयास्थाम्, त्रप्सीध्वम्, त्रप्सीय, त्रप्सीवहि, त्रप्सीमहि। लुङ्- (इट्पक्षे) अत्रपिष्ट, अत्रपिषाताम्, अत्रपिषत, अत्रपिष्ठाः, अत्रपिषाथाम्, अत्रपिष्ट्वम्, अत्रपिषि, अत्रपिष्वहि, अत्रपिष्महि। (इडभावपक्षे) अत्रप्त, अत्रप्साताम्, अत्रप्सत, अत्रप्थाः, अत्रप्साथाम्, अत्रब्ध्वम्, अत्रप्सि, अत्रप्स्वहि, अत्रप्स्महि। लुङ्- (इट्पक्षे) अत्रपिष्यत, अत्रपिष्येताम्, अत्रपिष्यन्त, अत्रपिष्यथाः, अत्रपिष्येथाम्, अत्रपिष्यध्वम्, अत्रपिष्ये, अत्रपिष्यावहि, अत्रपिष्यामहि। (इडभावपक्षे) अत्रप्स्यत, अत्रप्स्येताम्, अत्रप्स्यन्त, अत्रप्स्यथाः, अत्रप्स्येथाम्, अत्रप्स्यध्वम्, अत्रप्स्ये, अत्रप्स्यावहि, अत्रप्स्यामहि।

अभ्यासः

आपने परस्मैपद और आत्मनेपद में क्या-क्या अन्तर पाया? आप इस विषय पर कम से कम दस पृष्ठ का एक व्याख्यात्मक लेख लिखिए। इस लेख में परस्मैपद और आत्मनेपद की तुलना होनी चाहिए और दोनों पदों का अन्तर स्पष्ट हो जाना चाहिए। आत्मनेपद और परस्मैपद होने में क्या कारण है, यह भी स्पष्ट होना चाहिए। इससे आपकी व्याख्या करने की शैली अभी से बन जायेगी और सूत्रों की तुलना और अन्तर करने की प्रवृत्ति भी बढ़ जायेगी और लट्-लकार से लृङ्-लकार के बीच में क्या भिन्नता है? यह भी स्पष्ट कीजिए।

अथोभयपदिनः

श्रिञ् सेवायाम्॥१॥ श्रयति, श्रयते। शिश्राय, शिश्रिये।

श्रयितासि, श्रयितासे। श्रयिष्यति, श्रयिष्यते। श्रयतु, श्रयताम्। अश्रयत्, अश्रयत। श्रयेत्, श्रयेत। श्रीयात्, श्रयिषीष्ट। चङ्। अशिश्रियत्, अशिश्रियत। अश्रयिष्यत्, अश्रयिष्यत। भृञ् भरणे॥२॥ भरति, भरते। बभार। बभ्रतुः। बभ्रुः। बभर्थ। बभृव। बभृम। बभ्रे। बभृषे। भर्तासि, भर्तासे। भरिष्यति, भरिष्यते। भरतु, भरताम्। अभरत्, अभरत। भरेत्, भरेत।

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अब भ्वादिगण में उभयपदी धातुओं का विवेचन आरम्भ करते हैं। श्रिञ् धातु में ञकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है। जित् होने के कारण स्वरितञितः कर्त्रीभिप्राये क्रियाफले से उभयपद का विधान होता है। यद्यपि यह सूत्र केवल आत्मनेपद का विधान करता है, तथापि कर्तृगामि क्रियाफल न होने पर आत्मनेपद नहीं हो पाता, अतः आत्मनेपद के निमित्त से रहित होने पर शेषात्कर्तरि परस्मैपदम् से स्वतः परस्मैपद हो जाता है। जैसे- पच् धातु भी उभयपदी है, देवदत्तः पचति= देवदत्त पकाता है, इस वाक्य में पाचनक्रिया यदि अपने लिए हो रही है तो आत्मनेपद का विधान होगा। जैसे- देवदत्तः पचते। दूसरे के लिए हो रही है तो परस्मैपद का विधान होगा। जैसे- देवदत्तः पचति। इसी तरह से पच् धातु से दोनों पद अर्थात् आत्मनेपद और परस्मैपद हो जायेंगे।

श्रिञ् सेवायाम्। श्रिञ् धातु सेवा करना अर्थ में है। ञकार की इत्संज्ञा हुई है, अतः उभयपदी हुआ। श्रिञ् धातु के एकाच् एवं अजन्त होते हुए भी ऊढ्रदन्तैः० कारिका के मध्य आता है। अतः यह सेट् है।

श्रयति, श्रयते। श्रि से लट्-लकार, परस्मैपद में तिप्, अनुबन्धलोप, सार्वधातुकसंज्ञा, शप् कर के श्रि+अ+ति बना। श्रि में इकार का सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण करके श्रे+अ+ति बना, अय् आदेश होकर श्र्+अय्+अति बना। वर्णसम्मेलन करके श्रयति बना। आत्मनेपद में त आता है और उसका टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व होता है और शेष प्रक्रिया श्रयति के समान ही है। इसी तरह आत्मनेपद में त, शप्, अनुबन्धलोप, सार्वधातुकसंज्ञा, गुण, अयादेश, एत्व एवं वर्णसम्मेलन करके श्रयते बनता है।

परस्मैपद लट्-लकार के रूप- श्रयति, श्रयतः, श्रयन्ति। श्रयसि, श्रयथः, श्रयथ। श्रयामि, श्रयावः, श्रयामः। आत्मनेपद में- श्रयते, श्रयेते, श्रयन्ते। श्रयसे, श्रयेथे, श्रयध्वे। श्रये, श्रयावहे, श्रयामहे।

शिश्राय। श्रि धातु से लिट् लकार, परस्मैपद में तिप्, उसके स्थान पर णल्, अनुबन्धलोप, श्रि+अ बना। द्वित्व, हलादिशेष करके शिश्रि+अ बना। अब अचि श्नुध ातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ से इकार के स्थान पर इयङ् प्राप्त था किन्तु णित् के परे होने पर उसे बाधकर अचो ञ्णिति से वृद्धि हुई, शिश्रै+अ बना, एचोऽयवायावः से आय् आदेश होकर शिश्र्+आय्+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर शिश्राय सिद्ध हुआ। इसी तरह उत्तमपुरुष के एकवचन में मिप् के स्थान पर णल् आदेश होने के बाद शिश्राय ही बनेगा और णित्

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न होने के पक्ष में गुण होकर शिश्रय बनेगा। शेष में इकार के स्थान पर अच्छि श्नुधातुभ्रुवां खोरियङुवङौ से इयङ् आदेश होकर शिश्र्+इय्=शिश्रिय् बनेगा और आगे अजादि में मिलेगा। इस तरह रूप सिद्ध होंगे- शिश्राय, शिश्रियतुः, शिश्रियुः। शिश्रियथ, शिश्रियथुः, शिश्रिय। शिश्राय-शिश्रय, शिश्रियिव, शिश्रियिम। आत्मनेपद में सभी जगह इयङ् ही होगा। इस तरह रूप बनते हैं- शिश्रिये, शिश्रियाते, शिश्रियिरे। शिश्रियिषे, शिश्रियाथे, शिश्रियिद्वे-शिश्रियिध्वे। शिश्रिये, शिश्रियिवहे, शिश्रियिमहे।

लुट् लकार में दोनों पदों में तासि, इट् का आगम, श्रि को गुण और अय् आदेश आदि होकर रूप बनते हैं- परस्मैपद में- श्रियिता, श्रियितारौ, श्रियितारः। श्रियितासि, श्रियितास्थः श्रियितास्थ। श्रियितास्मि, श्रियितास्वः, श्रियितास्मः। आत्मनेपद में- श्रियिता, श्रियितारौ, श्रियितारः। श्रियितासे, श्रियितासाथे, श्रियिताध्वे। श्रियिताहे, श्रियितास्वहे, श्रियितास्महे।

लृट् लकार में स्य, इट् का आगम, गुण, अय् आदेश, स्य के सकार को षत्व आदि हो जाते हैं और रूप बनते हैं- परस्मैपद में- श्रियिष्यति, श्रियिष्यतः, श्रियिष्यन्ति। श्रियिष्यसि, श्रियिष्यथः, श्रियिष्यथ। श्रियिष्यामि, श्रियिष्यावः, श्रियिष्यामः। आत्मनेपद में- श्रियिष्यते, श्रियिष्येते, श्रियिष्यन्ते। श्रियिष्यसे, श्रियिष्येथे, श्रियिष्यध्वे। श्रियिष्ये, श्रियिष्यावहे, श्रियिष्यामहे।

लोट् लकार में दोनों पदों में शप्, गुण और अय् आदेश होकर रूप बनते हैं- परस्मैपद में- श्रियतु-श्रियतात्, श्रियताम्, श्रियन्तु। श्रिय-श्रियतात्, श्रियतम्, श्रियत। श्रियाणि, श्रियाव, श्रियाम। आत्मनेपद में- श्रियताम्, श्रियेताम्, श्रियन्ताम्। श्रियस्व, श्रियेथाम्, श्रियध्वम्। श्रियै, श्रियावहै, श्रियामहै।

लङ् लकार में दोनों पदों में अट् का आगम, शप्, गुण और अय् आदेश आदि होकर रूप बनते हैं- परस्मैपद में- अश्रियत्, अश्रियताम्, अश्रियन्। अश्रियः, अश्रियतम्, अश्रियत। अश्रियम्, अश्रियाव, अश्रियाम। आत्मनेपद में अश्रियत, अश्रियेताम्, अश्रियन्त। अश्रियथाः, अश्रियेथाम्, अश्रियध्वम्। अश्रिये, अश्रियावहि, अश्रियामहि।

विधिलिङ् लकार के परस्मैपद में- शप्, यासुट् आगम, गुण, अयादेश आदि होकर रूप बनते हैं- श्रियेत्, श्रियेताम्, श्रियेयुः। श्रियेः, श्रियेतम्, श्रियेत। श्रियेयम्, श्रियेव, श्रियेम। आत्मनेपद में यासुट् न होकर सीयुट् होता है। इस तरह रूप बनते हैं- श्रियेत, श्रियेयाताम्, श्रियेरन्। श्रियेथाः श्रियेयाथाम्, श्रियेध्वम्। श्रियेय, श्रियेवहि, श्रियेमहि।

श्रीयात्। श्रि धातु के आशीर्लिङ् के परस्मैपद में यासुट् करने पर यकारादि प्रत्यय मिल जाता है, अतः अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः से दीर्घ होकर रूप बनते हैं- श्रीयात्, श्रीयास्ताम्, श्रीयासुः। श्रीयाः, श्रीयास्तम्, श्रीयास्त। श्रीयासम्, श्रीयास्व, श्रीयास्म। आत्मनेपद में सीयुट्, इट् आगम, त और थ को सुट् का आगम, षत्व, गुण, अयादेश आदि होकर रूप बनते हैं- श्रियिषीष्ट, श्रियिषीयास्ताम्, श्रियिषीरन्। श्रियिषीष्ठाः, श्रियिषीयास्थाम्, श्रियिषीद्वम्-श्रियिषीध्वम्, श्रियिषीय, श्रियिषीवहि, श्रियिषीमहि।

आप उपर्युक्त रूपों की सिद्धि तभी कर सकेंगे जब भू धातु और एध धातु के रूप पूर्णतया कण्ठस्थ हों और उनकी प्रक्रिया भी उसी तरह याद हो। अन्यथा ये रूप आप कभी नहीं बना सकेंगे।

अशिश्रियत्। श्रि धातु से लुङ्-लकार, तिप्, अट् का आगम, अ श्रि ति, इकारलोप, अश्रि त्, च्लि, उसके स्थान पर सिच् प्राप्त, उसे बाधकर के णिश्रिद्रुसुभ्यः