Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 12
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VṛttiGovind
LSK 534
दीर्घविधायकं विधिसूत्रम्
दीर्घो लघोः
Aṣṭādhyāyī 7.4.94
Vṛtti Varadarājācārya

लघोरभ्यासस्य दीर्घः स्यात् सन्वद्भावविषये। अचीकमत। णिङ्भावपक्षे-

वार्तिकम्- कमेश्च्लेश्चङ् वाच्यः। अचकमत। अकामयिष्यत। अकमिष्यत।

अय गतौ॥३॥

अयते।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५३४- दीर्घो लघो:। दीर्घः प्रथमान्तं, लघो: षष्ठ्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अत्र लोपोऽभ्यासस्य

से अभ्यासस्य की अनुवृत्ति आती है।

सन्वद्भाव के विषय में अभ्यास के लघु को दीर्घ होता है।

अचीकमत। कामि से लुङ्, त, अट् का आगम करके अकामि+त बना। च्लि

लुङि से च्लि, उसके स्थान पर च्ले: सिच् से सिच् आदेश प्राप्त था, उसे बाधकर के

णिश्रिद्रुमुभ्यः कर्तरि चङ् से चङ् आदेश हुआ। अकामि+अत बना। णेरनिटि से णि

वाले इकार का लोप हुआ। अकाम्+अत बना। णौ चङ्युपधाया ह्रस्वः से ककारोत्तरवर्ती

अकार को ह्रस्व होकर अकम्+अत बना। कम् को चङि से द्वित्व हुआ- कम्-कम्,

हलादिशेष, ककम् बना, कुहोश्चु: से चुत्व होकर चकम्, इस तरह अचकम्+अत बना।

प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् के अनुसार णि का लोप होने पर भी आवश्यकता के अनुसार

उसको मानकर होने वाला अङ्ग कार्य होता है तो यहाँ पर चङ् के अकार रूप प्रत्यय के

परे ककम् अङ्ग है। अत: सन्वल्लघुनि चङ्परेऽनग्लोपे से सन्वद्भाव हुआ अर्थात् चकम्

इस अभ्यास में लघुपर है ककारोत्तरवर्ती अकार और उससे पूर्व च को सन् परे होने पर होने

वाले कार्य हो जाय, इस प्रकार का अतिदेश इस सूत्र से हुआ। अब सन्यतः से अचकम्+अत

में चकारोत्तरवर्ती अकार को इत्व हुआ- अचकम्+अत बना। इसके बाद दीर्घो लघो: से

चि के इकार को दीर्घ हुआ- अचीकम्+अत बना। वर्णसम्मेलन होकर अचीकमत सिद्ध

हुआ। इस रूप को सिद्ध करने में छात्रगण प्रायः गलती करते हैं। अत: इसका अभ्यास

बार-बार होना चाहिए। णिजन्त आदि प्रकरणों में इस प्रकार की प्रक्रिया ज्यादा होती है।

लुङ् में णिङ्पक्ष के रूप- अचीकमत, अचीकमेताम्, अचीकमन्त, अचीकमथा:, अचीकमेथाम्,

अचीकमध्वम्, अचीकमे, अचीकमावहि, अचकमामहि।

णिङ् न होने के पक्ष चङ् भी प्राप्त नही होगा। अत: अगला वार्तिक लगता है-

कमेश्च्लेश्चङ् वाच्यः। कम धातु से परे च्लि को चङ् हो, ऐसा कहना चाहिए।

णिङ् न होने पर सन्वद्भाव भी नहीं होगा, अत: इत्व भी नहीं होगा। वार्तिक से चङ् होने

के कारण द्वित्व आदि कार्य होंगे। इसी तरह अकामि+अत, अकाम्+अत, अकम्+अत,

कम्-कम्, ककम्, चकम्, अचकम्+अत होते हुए अचकमत यह रूप सिद्ध होता है।

णिङ् न होने के पक्ष के रूप- अचकमत, अचकमेताम्, अचकमन्त, अचकमथा:, अचकमेथाम्,

अचकमध्वम्, अचकमे, अचकमावहि, अचकमामहि।

लृङ्- णिङ्पक्षे- अकामयिष्यत, अकामयिष्येताम्, अकामयिष्यन्त, अकामयिष्यथा:,

अकामयिष्येथाम्, अकामयिष्यध्वम्, अकामयिष्ये, अकामयिष्यावहि, अकामयिष्यामहि। णिङ्

के अभाव पक्ष में अकमिष्यत, अकमिष्येताम् आदि रूप बनते हैं।